वफ़ा Poetry (page 31)

ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम

मेरी फ़रियाद पे रोया है चमन मेरे बा'द

इक़बाल आबिदी

हैं जो मुरव्वज मेहर-ओ-वफ़ा के सब सर-रिश्ते भूल गए

इंशा अल्लाह ख़ान

मिटती क़द्रों में भी पाबंद-ए-वफ़ा हैं हम लोग

इंद्र मोहन मेहता कैफ़

अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब

इन्दिरा वर्मा

यूँ वफ़ा के सारे निभाओ ग़म कि फ़रेब में भी यक़ीन हो

इन्दिरा वर्मा

मोहब्बत में आया है तन्हा अभी रंग

इन्दिरा वर्मा

कुछ बला और कुछ सितम ही सही

इन्दिरा वर्मा

अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब

इन्दिरा वर्मा

आसूदा-ए-मता-ए-करम बोलते नहीं

इनाम हनफ़ी

हर बे-ख़ता है आज ख़ता-कार देखना

इम्तियाज़ साग़र

हार ही जीत है आईन-ए-वफ़ा की रू से

इमरान-उल-हक़ चौहान

अपने हिस्से में ही आने थे ख़सारे सारे

इमरान-उल-हक़ चौहान

मैं सारी उम्र अहद-ए-वफ़ा में लगा रहा

इमरान हुसैन आज़ाद

ख़िज़ाँ के होश किसी रोज़ मैं उड़ाता हुआ

इमरान हुसैन आज़ाद

तेरी जानिब से मुझ पे क्या न हुआ

इम्दाद इमाम असर

सूली चढ़े जो यार के क़द पर फ़िदा न हो

इम्दाद इमाम असर

जफ़ाएँ होती हैं घुटता है दम ऐसा भी होता है

इम्दाद इमाम असर

आँखें न जीने देंगी तिरी बे-वफ़ा मुझे

इमदाद अली बहर

मैं उस बुत का वस्ल ऐ ख़ुदा चाहता हूँ

इमदाद अली बहर

महबूब-ए-ख़ुदा ने तुझे नायाब बनाया

इमदाद अली बहर

ख़ुदा-परस्त हुए हम न बुत-परस्त हुए

इमदाद अली बहर

हर तरफ़ मज्मा-ए-आशिक़ाँ है

इमदाद अली बहर

फ़ुर्क़त की आफ़त बुरे दिन काटना साल है

इमदाद अली बहर

आश्ना कोई बा-वफ़ा न मिला

इमदाद अली बहर

हैं अश्क मिरी आँखों में क़ुल्ज़ुम से ज़्यादा

इमाम बख़्श नासिख़

जो मज़े आज तिरे ग़म के अज़ाबों में मिले

इमाम अाज़म

गरचे क़लम से कुछ न लिखेंगे मुँह से कुछ नहीं बोलेंगे

इलियास इश्क़ी

दिल है और ख़ुद नगरी ज़ौक़-ए-दुआ जिस को कहें

इज्तिबा रिज़वी

तक़दीर-ए-वफ़ा का फूट जाना

इफ़्तिख़ार राग़िब

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