यार Poetry (page 49)
जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया
बशीरुद्दीन राज़
छेड़ा ज़रा सबा ने तो गुलनार हो गए
बशर नवाज़
गया शबाब न पैग़ाम-ए-वस्ल-ए-यार आया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
छुप सका दम भर न राज़-ए-दिल फ़िराक़-ए-यार में
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ज़ेर-ए-ज़मीं हूँ तिश्ना-ए-दीदार-ए-यार का
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
लाख पर्दे से रुख़-ए-अनवर अयाँ हो जाएगा
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
गया शबाब न पैग़ाम-ए-वस्ल-ए-यार आया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
देखी जो ज़ुल्फ़-ए-यार तबीअत सँभल गई
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
दिल जो सूरत-गर-ए-मअ'नी का सनम-ख़ाना बने
बर्क़ देहलवी
ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
यकसाँ लगें हैं उन को तो दैर-ओ-हरम बहम
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
सैर में तेरी है बुलबुल बोस्ताँ बे-कार है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इस लब से रस न चूसे क़दह और क़दह से हम
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
हाँ मियाँ सच है तुम्हारी तो बला ही जाने
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ैरत-ए-गुल है तू और चाक-गरेबाँ हम हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक-न-शुद दो-शुद
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक न-शुद दो शुद
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
आहें अफ़्लाक में मिल जाती हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शाहिद-ए-ग़ैब हुवैदा न हुआ था सो हुआ
बाक़र आगाह वेलोरी
रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा
बाक़र आगाह वेलोरी
अगरचे दिल को ले साथ अपने आया अश्क मिरा
बाक़र आगाह वेलोरी
मैं बरहमन ओ शैख़ की तकरार से समझा
बहराम जी
कहता है यार जुर्म की पाते हो तुम सज़ा
बहराम जी
ढूँढ कर दिल में निकाला तुझ को यार
बहराम जी
यार को हम ने बरमला देखा
बहराम जी
रखा सर पर जो आया यार का ख़त
बहराम जी
कुफ़्र एक रंग-ए-क़ुदरत-ए-बे-इंतिहा में है
बहराम जी
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