ज़ीस्त Poetry (page 14)

रातों के अंधेरों में ये लोग अजब निकले

फ़रहत क़ादरी

नए मिज़ाज की तश्कील करना चाहते हैं

फ़रहत नदीम हुमायूँ

उदास शाम में पज़मुर्दा बाद बन के न आ

फ़रहान सालिम

तो मुझे एक झलक भी नहीं दिखलानी क्या

फ़राज़ महमूद फ़ारिज़

ज़िंदगी चुपके से इक बात कहा करती है

फ़रह इक़बाल

किसी के एक इशारे में किस को क्या न मिला

फ़ानी बदायुनी

तेरा निगाह-ए-शौक़ कोई राज़-दाँ न था

फ़ानी बदायुनी

क़िस्सा-ए-ज़ीस्त मुख़्तसर करते

फ़ानी बदायुनी

मिज़ाज-ए-दहर में उन का इशारा पाए जा

फ़ानी बदायुनी

किसी के एक इशारे में किस को क्या न मिला

फ़ानी बदायुनी

ख़ुशी से रंज का बदला यहाँ नहीं मिलता

फ़ानी बदायुनी

बला से बर्क़ ने फूँका जो आशियाने को

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

सुब्ह-ए-नौ लाती है हर शाम तुम्हें क्या मा'लूम

फ़ैज़ुल हसन

तमाम हुस्न-ओ-मआ'नी का रंग उड़ने लगा

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

शोर-ए-बरबत-ओ-नय

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शहर-ए-याराँ

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मौज़ू-ए-सुख़न

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ईरानी तलबा के नाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इंतिज़ार

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम तो मजबूर थे इस दिल से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आख़िरी ख़त

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आलम-ए-बर्ज़ख़

फ़हमीदा रियाज़

रस्ते में शाम हो गई क़िस्सा तमाम हो चुका

फ़हीम शनास काज़मी

दामन तेरा मुझ से छूटा मिलने के हालात नहीं

एलिज़ाबेथ कुरियन मोना

राह-ए-तलब में अहल-ए-दिल जब हद-ए-आम से बढ़े

एजाज़ वारसी

मदावा-ए-जुनूँ सैर-ए-गुलिस्ताँ से नहीं होता

एजाज़ वारसी

जज़्बात की शिद्दत से निखरता है बयाँ और

एहसान जाफ़री

मक़्सद-ए-ज़ीस्त ग़म-ए-इश्क़ है सहरा हो कि शहर

एहसान दानिश

नज़र फ़रेब-ए-क़ज़ा खा गई तो क्या होगा

एहसान दानिश

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