Couplets Poetry (page 217)

सुनते रहे हैं आप के औसाफ़ सब से हम

नूह नारवी

शर्मा के बिगड़ के मुस्कुरा कर

नूह नारवी

सत्या-नास हो गया दिल का

नूह नारवी

साक़ी जो दिल से चाहे तो आए वो ज़माना

नूह नारवी

पूरी न अगर हो तो कोई चीज़ नहीं है

नूह नारवी

पामाल हो के भी न उठा कू-ए-यार से

नूह नारवी

नूह बैठे हैं चारपाई पर

नूह नारवी

न मिलो खुल के तो चोरी की मुलाक़ात रहे

नूह नारवी

मुझ को ये फ़िक्र कि दिल मुफ़्त गया हाथों से

नूह नारवी

मुझ को नज़रों के लड़ाने से है काम

नूह नारवी

मुझ को ख़याल-ए-अबरू-ए-ख़मदार हो गया

नूह नारवी

मिलना जो न हो तुम को तो कह दो न मिलेंगे

नूह नारवी

मज़हब-इश्क़-ओ-वफ़ा मुझ को ये देता है सलाह

नूह नारवी

मौसम-ए-गुल अभी नहीं आया

नूह नारवी

माजरा-ए-क़ैस मेरे ज़ेहन में महफ़ूज़ है

नूह नारवी

मैं कोई हाल-ए-सितम मुँह से कहूँ या न कहूँ

नूह नारवी

महफ़िल में तेरी आ के ये बे-आबरू हुए

नूह नारवी

लैला है न मजनूँ है न शीरीं है न फ़रहाद

नूह नारवी

कुछ और बन पड़ी न सवाल-ए-विसाल पर

नूह नारवी

कोई यहाँ से चल दिया रौनक़-ए-बाम-ओ-दर नहीं

नूह नारवी

ख़ुदा के सज्दे बुतों के आगे फिर ऐसे सज्दे कि सर न उट्ठे

नूह नारवी

ख़ुदा के डर से हम तुम को ख़ुदा तो कह नहीं सकते

नूह नारवी

ख़ाक हो कर ही हम पहुँच जाते

नूह नारवी

कम्बख़्त कभी जी से गुज़रने नहीं देती

नूह नारवी

कह रही है ये तिरी तस्वीर भी

नूह नारवी

काबा हो कि बुत-ख़ाना हो ऐ हज़रत-ए-वाइज़

नूह नारवी

का'बा हो दैर हो दोनों में है जल्वा उस का

नूह नारवी

जो वक़्त जाएगा वो पलट कर न आएगा

नूह नारवी

जो अहल-ए-ज़ौक़ हैं वो लुत्फ़ उठा लेते हैं चल फिर कर

नूह नारवी

जिगर की चोट ऊपर से कहीं मा'लूम होती है

नूह नारवी