Friendship Poetry (page 40)

इक तिश्ना-लब ने बढ़ के जो साग़र उठा लिया

फ़ना निज़ामी कानपुरी

डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता

फ़ना बुलंदशहरी

वो और होंगे जिन को हरम की तलाश है

फ़ना बुलंदशहरी

उन के जल्वों पे हमा-वक़्त नज़र होती है

फ़ना बुलंदशहरी

तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

तेरी नज़रों पे तसद्दुक़ आज अहल-ए-होश हैं

फ़ना बुलंदशहरी

तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त

फ़ना बुलंदशहरी

न दहर में न हरम में जबीं झुकी होगी

फ़ना बुलंदशहरी

मुझ को दुनिया के हर इक ग़म से छुड़ा रक्खा है

फ़ना बुलंदशहरी

किस तरह छोड़ दूँ ऐ यार मैं चाहत तेरी

फ़ना बुलंदशहरी

किस को सुनाऊँ हाल-ए-ग़म कोई ग़म-आश्ना नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द

फ़ना बुलंदशहरी

काफ़िर-ए-इश्क़ को क्या से क्या कर दिया

फ़ना बुलंदशहरी

जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया

फ़ना बुलंदशहरी

जब तक मिरी निगाह में तेरा जमाल है

फ़ना बुलंदशहरी

जब तक मिरे होंटों पे तिरा नाम रहेगा

फ़ना बुलंदशहरी

हरम है क्या चीज़ दैर क्या है किसी पे मेरी नज़र नहीं है

फ़ना बुलंदशहरी

हाँ वही इश्क़-ओ-मोहब्बत की जिला होती है

फ़ना बुलंदशहरी

है वज्ह कोई ख़ास मिरी आँख जो नम है

फ़ना बुलंदशहरी

दुनिया के हर ख़याल से बेगाना कर दिया

फ़ना बुलंदशहरी

अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता

फ़ना बुलंदशहरी

ऐ सनम देर न कर अंजुमन-आरा हो जा

फ़ना बुलंदशहरी

अब तसव्वुर में हरम है न सनम-ख़ाना है

फ़ना बुलंदशहरी

मुश्किल से चमन में हमें एक बार मिला फूल

फख्र ज़मान

लम्हों का भँवर चीर के इंसान बना हूँ

फख्र ज़मान

रेशम ज़ुल्फ़ के तार भी बातें करते हैं

फख़्र अब्बास

घर से तुम्हारी दी हुई चीज़ें निकाल दें

फख़्र अब्बास

तपता सूरज शाम को ढल जाएगा

फ़ैज़ी सम्बलपुरी

गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी