Love Poetry (page 224)
लहरों में बदन उछालते हैं
अय्यूब ख़ावर
किन आवाज़ों का सन्नाटा मुझ में है
अय्यूब ख़ावर
इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते
अय्यूब ख़ावर
हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना
अय्यूब ख़ावर
घर दरवाज़े से दूरी पर सात समुंदर बीच
अय्यूब ख़ावर
इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के
अय्यूब ख़ावर
बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना
अय्यूब ख़ावर
अब तो आए नज़र में जो भी हो
अय्यूब ख़ावर
आ जाए न रात कश्तियों में
अय्यूब ख़ावर
हम चाहते थे माह-ए-दरख़्शाँ को देखना
आएशा मसूद मलिक
उस ने हमारे हाथ में इक हाथ क्या दिया
आएशा मसूद मलिक
दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं
अयाज़ झाँसवी
उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की
औरंगज़ेब
पूछते हैं तुझ को सफ़्फ़ाकी कहाँ रह कर मिली
औरंगज़ेब
निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है
औरंगज़ेब
ख़ुश बहुत आते हैं मुझ को रास्ते दुश्वार से
औरंगज़ेब
जो कहा था तुम्हें सुना भी था
औरंगज़ेब
इश्क़ से मैं डर चुका था डर चुका तो तुम मिले
औरंगज़ेब
इश्क़ क्या है बेबसी है बेबसी की बात कर
औरंगज़ेब
हवस ने मुझ से पूछा था तुम्हारा क्या इरादा है
औरंगज़ेब
आम रस्ते से हट के आया हूँ
औरंगज़ेब
आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक
औरंगज़ेब
आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है
औरंगज़ेब
आइने से गुज़रने वाला था
औरंगज़ेब
आइना है ख़याल की हैरत
औरंगज़ेब
आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर
औरंगज़ेब
उभरते चाँद सितारों का तज़्किरा भी करो
औलाद अली रिज़वी
शिकस्ता-दिल की ख़ुशी दोस्तो ख़ुशी तो न थी
औलाद अली रिज़वी
नाव तूफ़ान में जब ज़ेर-ओ-ज़बर होती है
औलाद अली रिज़वी
न पूछो कैसे शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है
औलाद अली रिज़वी