Love Poetry (page 222)

ख़ुलूस-ए-नियत-ए-रहबर पे मुनहसिर है 'अज़ीम'

अज़ीम मुर्तज़ा

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

वही यकसानियत-ए-शाम-ओ-सहर है कि जो थी

अज़ीम मुर्तज़ा

तेरा ख़याल भी है वज़-ए-ग़म का पास भी है

अज़ीम मुर्तज़ा

तिरा ख़याल भी है वज़-ए-ग़म का पास भी है

अज़ीम मुर्तज़ा

महरूमी के दुख और तन्हाई के रंज उठाए

अज़ीम मुर्तज़ा

लाई न सबा बू-ए-चमन अब के बरस भी

अज़ीम मुर्तज़ा

कुछ भी हो मिरा हाल नुमायाँ तो नहीं है

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ुग़ाँ से तर्क-ए-फ़ुग़ाँ तक हज़ार तिश्ना-लबी है

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ित्ना-सामाँ ही नहीं फ़ित्ना-ए-सामाँ निकले

अज़ीम मुर्तज़ा

अफ़्साना-ए-हयात-ए-परेशाँ के साथ साथ

अज़ीम मुर्तज़ा

शबाब आया तड़पने और तड़पाने का वक़्त आया

अाज़म जलालाबादी

दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सके

आज़म चिश्ती

कभी नाकामियों का अपनी हम मातम नहीं करते

आज़ाद गुरदासपुरी

ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!! आ दो घड़ी मिल कर रहें

आज़ाद गुलाटी

कुछ ऐसे फूल भी गुज़रे हैं मेरी नज़रों से

आज़ाद गुलाटी

हर इक ने देखा मुझे अपनी अपनी नज़रों से

आज़ाद गुलाटी

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी

आज़ाद गुलाटी

देखने वाले मुझे मेरी नज़र से देख ले

आज़ाद गुलाटी

उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर

आज़ाद गुलाटी

तुम्हारे पास रहें हम तो मौत भी क्या है

आज़ाद गुलाटी

तेरे क़दमों की आहट को तरसा हूँ

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए

आज़ाद गुलाटी

मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है

आज़ाद गुलाटी

मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ

आज़ाद गुलाटी

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी

लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई

आज़ाद गुलाटी

ख़ुद हमीं को राहतों के कैफ़ का चसका न था

आज़ाद गुलाटी