Love Poetry (page 220)
शुरू-ए-इश्क़ में लोगों ने इतनी शिद्दत की
अज़हर इनायती
रंगतें मासूम चेहरों की बुझा दी जाएँगी
अज़हर इनायती
क़यामत आएगी माना ये हादिसा होगा
अज़हर इनायती
नज़र की ज़द में सर कोई नहीं है
अज़हर इनायती
क्या क्या नवाह-ए-चश्म की रानाइयाँ गईं
अज़हर इनायती
कुछ आरज़ी उजाले बचाए हुए हैं लोग
अज़हर इनायती
ख़त उस के अपने हाथ का आता नहीं कोई
अज़हर इनायती
कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं
अज़हर इनायती
इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा
अज़हर इनायती
इस हादसे को देख के आँखों में दर्द है
अज़हर इनायती
इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले
अज़हर इनायती
इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए
अज़हर इनायती
हर एक रात को महताब देखने के लिए
अज़हर इनायती
घर तो हमारा शो'लों के नर्ग़े में आ गया
अज़हर इनायती
ग़मों से यूँ वो फ़रार इख़्तियार करता था
अज़हर इनायती
दियों से आग जो लगती रही मकानों को
अज़हर इनायती
चलते चलते साल कितने हो गए
अज़हर इनायती
बनाए ज़ेहन परिंदों की ये क़तार मिरा
अज़हर इनायती
अज़िय्यत उस की ज़ेहनी दूर कर दे
अज़हर इनायती
अपने आँचल में छुपा कर मिरे आँसू ले जा
अज़हर इनायती
ये कम नहीं के वही शाम का सितारा है
अज़हर हाश्मी
वफ़ा ख़ुलूस का सिंगार रोज़ करती है
अज़हर हाश्मी
तस्बीह-ए-कुमरी सर्व-ए-सनोबर समेट लो
अज़हर हाश्मी
ख़ामोश ज़बाँ से जब तक़रीर निकलती है
अज़हर हाश्मी
जो दौलत तरक़्क़ी-रसाई बहुत है
अज़हर हाश्मी
गुज़रे हुए लम्हात को अब ढूँड रहा हूँ
अज़हर हाश्मी
गर इक़्तिदार-ए-सुकूँ इक़्तिदार-ए-वहशत है
अज़हर हाश्मी
बस रंज की है दास्ताँ उन्वान हज़ारों
अज़हर हाश्मी
आज़ुर्दा निगाहों पे ये मंज़र नहीं उतरा
अज़हर हाश्मी
अटूट अंग
अज़हर गौरी