Love Poetry (page 225)
न जिस का कोई सहारा हो वो किधर जाए
औलाद अली रिज़वी
ख़दशे थे शाम-ए-हिज्र के सुब्ह-ए-ख़ुशी के साथ
औलाद अली रिज़वी
जहाँ निफ़ाक़ के शो'ले मिलें बुझा के चलो
औलाद अली रिज़वी
घुटी घुटी सी फ़ज़ा में शगुफ़्तगी तो मिली
औलाद अली रिज़वी
गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे
औलाद अली रिज़वी
निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है
अतुल अजनबी
इक थकन क़ुव्वत-ए-इज़हार में आ जाती है
अतुल अजनबी
तिरे फ़लक ही से टूटने वाली रौशनी के हैं अक्स सारे
अतीक़ुल्लाह
आईना आईना तैरता कोई अक्स
अतीक़ुल्लाह
मैं कि तुम पे बाज़ हूँ
अतीक़ुल्लाह
कितना मुश्किल है
अतीक़ुल्लाह
हमारे मा-बैन
अतीक़ुल्लाह
अब्बा के नाम
अतीक़ुल्लाह
वो मेरे नाले का शोर ही था शब-ए-सियह की निहायतों में
अतीक़ुल्लाह
क़ल्ब-गह में ज़रा ज़रा सा कुछ
अतीक़ुल्लाह
मैं छुपा रहूँगा निगाह-ओ-ज़ख़्म की ओट में
अतीक़ुल्लाह
क्या तुम ने कभी ज़िंदगी करते हुए देखा
अतीक़ुल्लाह
ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए
अतीक़ुल्लाह
जब भी तन्हाई के एहसास से घबराता हूँ
अतीक़ुल्लाह
दिल के नज़दीक तो साया भी नहीं है कोई
अतीक़ुल्लाह
चराग़ हाथों के बुझ रहे हैं सितारा हर रह-गुज़र में रख दे
अतीक़ुल्लाह
आसमाँ का सितारा न महताब है
अतीक़ुल्लाह
आने वाला तो हर इक लम्हा गुज़र जाता है
अतीक़ुल्लाह
वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी
आतिफ़ ख़ान
मैं इंसान-ए-नौअ' हूँ मैं ईसा-नफ़स हूँ
आतिफ़ ख़ान
कर के ख़्वाब आँख में पहले तो वो लाए ख़ुद को
आतिफ़ ख़ान
इश्क़ पागल-पन में संजीदा न हो जाए कहीं
आतिफ़ ख़ान
एक वो ही शख़्स मुझ को अब गवारा भी नहीं
आतिफ़ ख़ान
दिए अपनी ज़ौ पे जो इतरा रहे हैं
आतिफ़ ख़ान
दरमियान-ए-गुनाह-ओ-सवाब आदमी
आतिफ़ ख़ान