बदन Poetry (page 6)

अब कहाँ दर्द जिस्म-ओ-जान में है

विजय शर्मा अर्श

ख़याल तेरे

वर्षा गोरछिया

जुदाई

वर्षा गोरछिया

कुछ तो मोहब्बतों की वफ़ाएँ निभाऊँ मैं

उषा भदोरिया

बस्ता-लब था वो मगर सारे बदन से बोलता था

उर्फ़ी आफ़ाक़ी

तअ'स्सुब की फ़ज़ा में ता'ना-ए-किरदार क्या देता

उनवान चिश्ती

बच्चे भी अब देख के उस को हँसते हैं

उनवान चिश्ती

मिरी भँवों के ऐन दरमियान बन गया

उमैर नजमी

जब इंसान को अपना कुछ इदराक हुआ

उमैर मंज़र

तुम जिसे चाँद कहते हो वो अस्ल में

त्रिपुरारि

मैं हासिल हो चुका हूँ जिस बदन को

त्रिपुरारि

नूर-जहाँ का मज़ार

तिलोकचंद महरूम

मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ

तौसीफ़ तबस्सुम

गर्द-आलूद दरीदा चेहरा यूँ है माह ओ साल के ब'अद

तौसीफ़ तबस्सुम

बहार दर्द भरा इक़्तिबास छोड़ गई

तौक़ीर अब्बास

वो रौशनी जो शफ़क़ का लिबास छोड़ गई

तौक़ीर अब्बास

इस रात किसी और क़लम-रौ में कहीं था

तारिक़ नईम

ऐसी तक़्सीम की सूरत निकल आई घर में

तारिक़ नईम

उस के बदन का लम्स अभी उँगलियों में है

तारिक़ जामी

डूबा हूँ तो किस शख़्स का चेहरा नहीं उतरा

तारिक़ जामी

नज़र का नश्शा बदन का ख़ुमार टूट गया

तारिक़ बट

अब नए रुख़ से हक़ाएक़ को उलट कर देखो

तारिक़ बट

ऐ रात मुझे माँ की तरह गोद में ले ले

तनवीर सिप्रा

बेटे को सज़ा दे के अजब हाल हुआ है

तनवीर सिप्रा

सूरतों के शहर में रौज़न ही रौज़न देख कर

तनवीर सामानी

फेंकें भी ये लिबास बदन का उतार के

तनवीर सामानी

जान मजबूर हूँ

तनवीर मोनिस

रिदा-ए-संग ओढ़ कर न सो गया हो काँच भी

तनवीर मोनिस

आज़ादी से नींदों तक

तनवीर अंजुम

तरीक़ कोई न आया मुझे ज़माने का

तनवीर अंजुम

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