मूर्ति Poetry (page 16)

कहूँ कि शैख़-ए-ज़माना हूँ लाफ़ तो ये है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

बा'द-ए-मकीं मकाँ का गर बाम रहा तो क्या हुआ

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

उस को ग़फ़लत-पेशा कह आते हैं हम

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

मुँह ढाँप के मैं जो रो रहा हूँ

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

खोल दी है ज़ुल्फ़ किस ने फूल से रुख़्सार पर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

हम ने तो बे-शुमार बहाने बनाए हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

क्यूँकर न आस्तीं में छुपा कर पढ़ें नमाज़

ग़ुलाम मौला क़लक़

ख़ुदा से डरते तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न करते हम

ग़ुलाम मौला क़लक़

हर संग में काबे के निहाँ इश्वा-ए-बुत है

ग़ुलाम मौला क़लक़

उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं

ग़ुलाम मौला क़लक़

रिश्ता-ए-रस्म-ए-मोहब्बत मत तोड़

ग़ुलाम मौला क़लक़

फिर वही हम हैं ख़याल-ए-रुख़-ए-ज़ेबा है वही

ग़ुलाम भीक नैरंग

इक हुजूम-ए-ग़म-ओ-कुलफ़त है ख़ुदा ख़ैर करे

ग़ुलाम भीक नैरंग

तसल्ली को हमारी बाग़बाँ कुछ और कहता है

ग़ुबार भट्टी

जल्वा-ए-हुस्न अगर ज़ीनत-ए-काशाना बने

ग़ुबार भट्टी

उस के कूचे में गया मैं सो फिर आया न गया

ग़मगीन देहलवी

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

मुखड़ा वो बुत जिधर करेगा

ग़मगीन देहलवी

वफ़ा-दारी ब-शर्त-ए-उस्तुवारी अस्ल ईमाँ है

ग़ालिब

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

ग़ालिब

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना

ग़ालिब

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

ग़ालिब

शुमार-ए-सुब्हा मर्ग़ूब-ए-बुत-ए-मुश्किल-पसंद आया

ग़ालिब

शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है

ग़ालिब

क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को

ग़ालिब

पए-नज़्र-ए-करम तोहफ़ा है शर्म-ए-ना-रसाई का

ग़ालिब

नक़्श-ए-नाज़-ए-बुत-ए-तन्नाज़ ब-आग़ोश-ए-रक़ीब

ग़ालिब

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

ग़ालिब

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए

ग़ालिब

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