दर्द Poetry (page 49)

आँख से बिछड़े काजल को तहरीर बनाने वाले

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं

ग़ुलाम मौला क़लक़

तुझे कल ही से नहीं बे-कली न कुछ आज ही से रहा क़लक़

ग़ुलाम मौला क़लक़

है ख़मोशी-ए-इंतिज़ार बला

ग़ुलाम मौला क़लक़

बे-गाना-अदाई है सितम जौर-ओ-सितम में

ग़ुलाम मौला क़लक़

ऐ सितम-आज़मा जफ़ा कब तक

ग़ुलाम मौला क़लक़

दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल अहल-ए-वफ़ा कहने लगे

ग़ुलाम हुसैन अयाज़

किस तरह वाक़िफ़ हों हाल-ए-आशिक़-ए-जाँ-बाज़ से

ग़ुलाम भीक नैरंग

कोई दो-चार नहीं महव-ए-तमाशा सब हैं

ग़ुफ़रान अमजद

कोई दो चार नहीं महव-ए-तमाशा सब हैं

ग़ुफ़रान अमजद

मिरे मुद्दआ-ए-उल्फ़त का पयाम बन के आई

ग़ुबार भट्टी

तुझे मैं भूल जाना चाहता हूँ

ग़यास अंजुम

हुजूम-ए-दर्द मिला इम्तिहान ऐसा था

ग़यास अंजुम

छुपा है कर्ब-ए-मुसलसल हवा के लहजे में

ग़यास अंजुम

आँधी में भी चराग़ मगन है सबा के साथ

ग़ौसिया ख़ान सबीन

आप अपने को मो'तबर कर लें

ग़नी एजाज़

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला

ग़ालिब अयाज़

रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई में मुआफ़

ग़ालिब

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना

ग़ालिब

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

ग़ालिब

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

ग़ालिब

ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक

ग़ालिब

वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँ न हो

ग़ालिब

वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को

ग़ालिब

तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो

ग़ालिब

शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है

ग़ालिब

शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला

ग़ालिब

शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है

ग़ालिब

कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया

ग़ालिब

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