दीवार Poetry (page 47)

बे-ज़बानों को भी गोयाई सिखाना चाहिए

अरशद अली ख़ान क़लक़

शर्त-ए-दीवार-ओ-दर-ओ-बाम उठा दी है तो क्या

अरशद अब्दुल हमीद

मुझ को तक़दीर ने यूँ बे-सर-ओ-आसार किया

अरशद अब्दुल हमीद

ग़लत नहीं है दिल-ए-सुल्ह-ख़ू जो बोलता है

अरशद अब्दुल हमीद

बस एक ही कैफ़िय्यत-ए-दिल सुब्ह-ओ-मसा है

अर्श सिद्दीक़ी

रहगुज़र रहगुज़र से पूछ लिया

अर्श मलसियानी

ताज-ए-ज़र्रीं न कोई मसनद-ए-शाही माँगूँ

अरमान नज्मी

मैं अब उक्ता गया हूँ फुर्क़तों से

आरिफ़ इशतियाक़

हालत-ए-हर्फ़ किस ने जानी है

आरिफ़ इमाम

ढूँढता हूँ सर-ए-सहरा-ए-तमन्ना ख़ुद को

आरिफ़ अब्दुल मतीन

ज़िंदगी मुझ को मिरी नज़रों में शर्मिंदा न कर

अक़ील शादाब

फैली है धूप जज़्बा-ए-इस्फ़ार देख कर

अक़ील जामिद

मेरी नज़र के लिए कोई रिवायत न थी

अनवर सिद्दीक़ी

अज़ाब-ए-हमसफ़री से गुरेज़ था मुझ को

अनवर सिद्दीक़ी

जो सुनता हूँ कहूँगा मैं जो कहता हूँ सुनूँगा मैं

अनवर शऊर

अकेले क्या पस-ए-दीवार-ओ-दर गए हम तुम

अनवर शऊर

ऐसे देखा है कि देखा ही न हो

अनवर शऊर

तुझ को तो क़ुव्वत-ए-इज़हार ज़माने से मिली

अनवर सदीद

ख़्वाबों की तफ़्सील बता कर जाएँगे

अनवर सदीद

रात आई है बलाओं से रिहाई देगी

अनवर मसूद

रात आई है बलाओं से रिहाई देगी

अनवर मसूद

पढ़ने भी न पाए थे कि वो मिट भी गई थी

अनवर मसूद

मैं जुर्म-ए-ख़मोशी की सफ़ाई नहीं देता

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

रोज़ उठ जाती है घर में कोई दीवार नई

अनवर जमाल अनवर

हम पे ताज़ीर ये रहने दीजे

अनवार फ़िरोज़

यूसुफ़-ए-हुस्न का हुस्न आप ख़रीदार रहा

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

ये सरकारी शिफ़ा-ख़ाने में जो बीमार लेटे हैं

अनवर बरेलवी

डूबते तारों से पूछो न क़मर से पूछो

अनवर मोअज़्ज़म

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