दिल Poetry (page 297)
यार को हम ने बरमला देखा
बहराम जी
किया है संदलीं-रंगों ने दर बंद
बहराम जी
कब तसव्वुर यार-ए-गुल-रुख़्सार का फ़े'अल-ए-अबस
बहराम जी
जो है याँ अासाइश-ए-रंज-ओ-मेहन में मस्त है
बहराम जी
हम न बुत-ख़ाने में ने मस्जिद-ए-वीराँ में रहे
बहराम जी
दूर हो दर्द-ए-दिल ये और दर्द-ए-जिगर किसी तरह
बहराम जी
दुनिया में इबादत को तिरी आए हुए हैं
बहराम जी
बहस क्यूँ है काफ़िर-ओ-दीं-दार की
बहराम जी
तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा
ज़फ़र
तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने
ज़फ़र
सब मिटा दें दिल से हैं जितनी कि उस में ख़्वाहिशें
ज़फ़र
न दूँगा दिल उसे मैं ये हमेशा कहता था
ज़फ़र
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
ज़फ़र
कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल
ज़फ़र
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
ज़फ़र
जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ
ज़फ़र
इधर ख़याल मिरे दिल में ज़ुल्फ़ का गुज़रा
ज़फ़र
हो गया जिस दिन से अपने दिल पर उस को इख़्तियार
ज़फ़र
हमदमो दिल के लगाने में कहो लगता है क्या
ज़फ़र
हाल-ए-दिल क्यूँ कर करें अपना बयाँ अच्छी तरह
ज़फ़र
ग़ज़ब है कि दिल में तो रक्खो कुदूरत
ज़फ़र
दिल को दिल से राह है तो जिस तरह से हम तुझे
ज़फ़र
देख दिल को मिरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़
ज़फ़र
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ज़फ़र
ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
ज़फ़र
ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो
ज़फ़र
याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है
ज़फ़र
वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले
ज़फ़र
वाक़िफ़ हैं हम कि हज़रत-ए-ग़म ऐसे शख़्स हैं
ज़फ़र
वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है
ज़फ़र
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