घर Poetry (page 81)

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है

ग़ालिब

वादा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है

ग़ालिब

कोई वीरानी सी वीरानी है

ग़ालिब

है ख़बर गर्म उन के आने की

ग़ालिब

एक हंगामे पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक़

ग़ालिब

दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं

ग़ालिब

छोड़ा न रश्क ने कि तिरे घर का नाम लूँ

ग़ालिब

बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए

ग़ालिब

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल

ग़ालिब

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'

ग़ालिब

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं

ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा 'ग़ालिब'

ग़ालिब

तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले

ग़ालिब

शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला

ग़ालिब

सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का

ग़ालिब

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो

ग़ालिब

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया

ग़ालिब

नाला जुज़ हुस्न-ए-तलब ऐ सितम-ईजाद नहीं

ग़ालिब

न हुई गर मिरे मरने से तसल्ली न सही

ग़ालिब

मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त

ग़ालिब

मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं

ग़ालिब

लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और

ग़ालिब

कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है

ग़ालिब

हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है

ग़ालिब

हुस्न ग़म्ज़े की कशाकश से छुटा मेरे बअ'द

ग़ालिब

हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं

ग़ालिब

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

ग़ालिब

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं

ग़ालिब

घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर

ग़ालिब

दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए

ग़ालिब

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