गुल Poetry (page 15)

वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए

सुरूर बाराबंकवी

फ़स्ल-ए-गुल क्या कर गई आशुफ़्ता सामानों के साथ

सुरूर बाराबंकवी

चमन वालों को रक़्साँ-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ ले के उट्ठी है

सुरूर बाराबंकवी

चमन में लाला-ओ-गुल पर निखार भी तो नहीं

सुरूर बाराबंकवी

आरज़ू जिन की है उन की अंजुमन तक आ गए

सुरूर बाराबंकवी

अपनी अना के गुम्बद-ए-बे-दर में बंद है

सूरज तनवीर

मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो

सुलतान रशक

हम ने माना कि जहाँ हम थे गुलिस्ताँ तो न था

सुल्तान गौरी

जिस को क़रीब पाया उसी से लिपट गए

सुल्तान अख़्तर

न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है

सुलेमान ख़ुमार

ये भी शायद तिरा अंदाज़-ए-दिल-आराई है

सुलैमान अरीब

निज़ाम-ए-शम्स-ओ-क़मर कितने दस्त-ए-ख़ाक में हैं

सुलैमान अरीब

जो तेरे हुस्न में नर्मी भी बाँकपन भी है

सुलैमान अरीब

नंग-ए-एहसास है अंदोह-ए-ग़रीब-उल-वतनी

सुलैमान आसिफ़

न इब्तिदा-ए-जुनूँ है न इंतिहा-ए-जुनूँ

सुहैल काकोरवी

हँस दिए ज़ख़्म-ए-जिगर जैसे कि गुल-हा-ए-बहार

सुहैल काकोरवी

नवाह-ए-जाँ में कहीं अबतरी सी लगती है

सुहैल अहमद ज़ैदी

मैं क्या करूँ कोई सब मेरे इख़्तियार में है

सुहैल अहमद ज़ैदी

इम्कान खुले दर का हर आन बहुत रक्खा

सुहैल अहमद ज़ैदी

गए मौसमों को भुला देंगे हम

सुहैल अहमद ज़ैदी

उठी है जो क़दमों से वो दामन से अड़ी है

सूफ़ी तबस्सुम

सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई

सूफ़ी तबस्सुम

मिटी मिटी हुई यादों के दाग़ क्या जलते?

सूफ़ी तबस्सुम

जब अश्क तिरी याद में आँखों से ढले हैं

सूफ़ी तबस्सुम

जवानी मिरी रंग लाने लगी है

सुदर्शन कुमार वुग्गल

लाख बदला बदल नहीं पाए

सोनरूपा विशाल

हुजूम-ए-गुल में रहे हम हज़ार दस्त दराज़

सिराजुद्दीन ज़फ़र

उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

मौसम-ए-गुल तिरे इनआ'म अभी बाक़ी हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

दिन को बहर-ओ-बर का सीना चीर कर रख दीजिए

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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