हुआ Poetry (page 138)

जान दी दी हुई उसी की थी

ग़ालिब

इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं

ग़ालिब

इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई

ग़ालिब

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे

ग़ालिब

है ख़बर गर्म उन के आने की

ग़ालिब

ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना

ग़ालिब

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

ग़ालिब

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

ग़ालिब

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब

बंदगी में भी वो आज़ादा ओ ख़ुद-बीं हैं कि हम

ग़ालिब

अदा-ए-ख़ास से 'ग़ालिब' हुआ है नुक्ता-सरा

ग़ालिब

ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना

ग़ालिब

याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे

ग़ालिब

वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक

ग़ालिब

वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा

ग़ालिब

उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए

ग़ालिब

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो

ग़ालिब

तू दोस्त किसू का भी सितमगर न हुआ था

ग़ालिब

तेरे तौसन को सबा बाँधते हैं

ग़ालिब

शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला

ग़ालिब

शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है

ग़ालिब

सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का

ग़ालिब

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं

ग़ालिब

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की

ग़ालिब

रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है

ग़ालिब

क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ

ग़ालिब

फिर इस अंदाज़ से बहार आई

ग़ालिब

फिर हुआ वक़्त कि हो बाल-कुशा मौज-ए-शराब

ग़ालिब

नवेद-ए-अम्न है बेदाद-ए-दोस्त जाँ के लिए

ग़ालिब

नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का

ग़ालिब

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