हुआ Poetry (page 137)

हम ने जब चाहा कोई आग बुझाने आए

ग़यास अंजुम

छुपा है कर्ब-ए-मुसलसल हवा के लहजे में

ग़यास अंजुम

मुंतज़िर

ग़ौसिया ख़ान सबीन

आँधी में भी चराग़ मगन है सबा के साथ

ग़ौसिया ख़ान सबीन

तीर जैसे कमान से निकला

ग़नी एजाज़

जुनूँ में देर से ख़ुद को पुकारता हूँ मैं

ग़नी एजाज़

बेवफ़ा के वा'दे पर ए'तिबार करते हैं

ग़नी एजाज़

बज़्म-ए-आलम में सदा हम भी नहीं तुम भी नहीं

ग़नी एजाज़

अंदाज़-ए-फ़िक्र अहल-ए-जहाँ का जुदा रहा

ग़नी एजाज़

'ग़मगीं' जो एक आन पे तेरे अदा हुआ

ग़मगीन देहलवी

उस के कूचे में गया मैं सो फिर आया न गया

ग़मगीन देहलवी

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

रंगों की बारिशों से धुँदला गया है मंज़र

ग़ालिब इरफ़ान

अल्फ़ाज़-ए-बे-सदा का इम्कान आइने में

ग़ालिब इरफ़ान

हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना

ग़ालिब अयाज़

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला

ग़ालिब अयाज़

ज़ोफ़ से गिर्या मुबद्दल ब-दम-ए-सर्द हुआ

ग़ालिब

थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े

ग़ालिब

था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ

ग़ालिब

सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं

ग़ालिब

साबित हुआ है गर्दन-ए-मीना पे ख़ून-ए-ख़ल्क़

ग़ालिब

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज

ग़ालिब

मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूँ

ग़ालिब

मैं और बज़्म-ए-मय से यूँ तिश्ना-काम आऊँ

ग़ालिब

मय वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब

ग़ालिब

क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी

ग़ालिब

कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं

ग़ालिब

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब

ग़ालिब

जम्अ करते हो क्यूँ रक़ीबों को

ग़ालिब

जब तक कि न देखा था क़द-ए-यार का आलम

ग़ालिब

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