गंतव्य Poetry (page 7)

सारी दुनिया के सितम और मिरा दिल तन्हा

तमन्ना जमाली

ग़म-ए-जहाँ में ग़म-ए-यार ज़म न कर पाया

तालिब हुसैन तालिब

दर्द-ए-दिल को दास्ताँ-दर-दास्ताँ होने तो दो

तल्हा रिज़वी बारक़

दूर तक परछाइयाँ सी हैं रह-ए-अफ़्कार पर

तख़्त सिंह

मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए

ताजवर नजीबाबादी

ज़ख़्म कब का था दर्द उठा है अब

ताजदार आदिल

मिरा बातिन मुझे हर पल नई दुनिया दिखाता है

तैमूर हसन

एक मंज़िल है एक जादा है

तैमूर हसन

कई पड़ाव थे मंज़िल की राह में 'ताबिश'

ताबिश कमाल

अजीब सुब्ह थी दीवार ओ दर कुछ और से थे

ताबिश कमाल

यूँ नक़ाब-ए-रुख़ मुक़ाबिल से उठी

ताबिश देहलवी

टूट कर अहद-ए-तमन्ना की तरह

ताबिश देहलवी

टूट कर अहद-ए-तमन्ना की तरह

ताबिश देहलवी

'ताबिश' हवस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ तक

ताबिश देहलवी

मंज़िलों को नज़र में रक्खा है

ताबिश देहलवी

देखिए अहल-ए-मोहब्बत हमें क्या देते हैं

ताबिश देहलवी

बंद-ए-ग़म मुश्किल से मुश्किल-तर खुला

ताबिश देहलवी

ये मय-कदा है कलीसा ओ ख़ानक़ाह नहीं

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

रह-ए-तलब में किसे आरज़ू-ए-मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मंज़िलें राह में थीं नक़्श-ए-क़दम की सूरत

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मिलेगा दर्द तो दरमाँ की आरज़ू होगी

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मिरी सहबा-परस्ती मोरीद-ए-इल्ज़ाम है साक़ी

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

हम एक उम्र जले शम-ए-रहगुज़र की तरह

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

हम एक उम्र जले शम-ए-रहगुज़र की तरह

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

हर सितम लुत्फ़ है दिल ख़ूगर-ए-आज़ार कहाँ

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

दाद भी फ़ित्ना-ए-बेदाद भी क़ातिल की तरफ़

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है

ताबाँ अब्दुल हई

मंज़िलों उस को आवाज़ देते रहे मंज़िलों जिस की कोई ख़बर भी न थी

ताब असलम

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