उम्र Poetry (page 11)

तुझ में सब मंज़र महफ़ूज़

सुलतान सुबहानी

सफ़ेद घोड़े पर सवार अजनबी

सुलतान सुबहानी

वो आज मुझ से जब मिली तो धुँद छट गई

सुलतान सुबहानी

तन्हाइयों की बर्फ़ थी बिस्तर पे जा-ब-जा

सुल्तान अख़्तर

शनाख़्त मिट गई चेहरे पे गर्द इतनी थी

सुलेमान ख़ुमार

न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है

सुलेमान ख़ुमार

कचोके दिल को लगाता हुआ सा कुछ तो है

सुलेमान ख़ुमार

गुज़रते लम्हों के दिल में क्या है हमें पता है

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

सुलेमान ख़ुमार

हिसाब-ए-उम्र करो या हिसाब-ए-जाम करो

सुलैमान अरीब

जन्नत से निकाला न जहन्नुम से निकाला

सुहैल अख़्तर

उजड़े दिल-ओ-दिमाग़ को आबाद कर सकूँ

सुहैल अहमद ज़ैदी

तमन्ना दिल में घर करती बहुत है

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई

सूफ़ी तबस्सुम

शजर शजर निगराँ है कली कली बेदार

सूफ़ी तबस्सुम

इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई

सूफ़ी तबस्सुम

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

सूफ़ी तबस्सुम

बुझी बुझी सी सितारों की रौशनी है अभी

सूफ़ी तबस्सुम

शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया

सुदर्शन फ़ाकिर

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं

सुदर्शन फ़ाकिर

पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं

सुदर्शन फ़ाकिर

दुश्मनी में ही सही वो ये करम करता रहा

सुभाष पाठक ज़िया

तेरा ही ज़िक्र हरसू तिरा ही बयाँ मिले

सिया सचदेव

रह कर भी तुझ से दूर तिरे आस-पास हूँ

सिया सचदेव

बग़ैर-ए-साग़र-ओ-यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

बग़ैर साग़र ओ यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

दिल से अब तो नक़्श-ए-याद-ए-रफ़्तगाँ भी मिट गया

सिराज मुनीर

क्यूँकि होवे ज़ाहिद ख़ुद-बीं मुरीद-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार

सिराज औरंगाबादी

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