उम्र Poetry (page 59)

कच्चे मकान जितने थे बारिश में बह गए

अख़्तर होशियारपुरी

कब धूप चली शाम ढली किस को ख़बर है

अख़्तर होशियारपुरी

वो रंग-ए-तमन्ना है कि सद-रंग हुआ हूँ

अख़्तर होशियारपुरी

शिकारी रात भर बैठे रहे ऊँची मचानों पर

अख़्तर होशियारपुरी

शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते

अख़्तर होशियारपुरी

मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया

अख़्तर होशियारपुरी

क्या पूछते हो मुझ से कि मैं किस नगर का था

अख़्तर होशियारपुरी

होंटों पे क़र्ज़-ए-हर्फ़-ए-वफ़ा उम्र भर रहा

अख़्तर होशियारपुरी

एक हम ही तो नहीं आबला-पा आवारा

अख़्तर होशियारपुरी

चेहरे के ख़द्द-ओ-ख़ाल में आईने जड़े हैं

अख़्तर होशियारपुरी

अपने क़दमों ही की आवाज़ से चौंका होता

अख़्तर होशियारपुरी

ऐ सोज़-ए-जाँ-गुदाज़ अभी मैं जवान हूँ

अख़्तर अंसारी

सदा कुछ ऐसी मिरे गोश-ए-दिल में आती है

अख़्तर अंसारी

आईना-ए-निगाह में अक्स-ए-शबाब है

अख़्तर अंसारी

तमाम उम्र गुज़र जाती है कभी पल में

अख़्तर अमान

तवील-तर है सफ़र मुख़्तसर नहीं होता

अख़्तर अमान

मोहब्बतों में बहुत रस भी है मिठास भी है

अख़्तर अमान

में महफ़िल-ए-हयात में हैरान सा रहा

अख़लाक़ अहमद आहन

अता हुई किसे सनद नज़र नज़र की बात है

अकबर हैदराबादी

काफ़िर था मैं ख़ुदा का न मुंकिर दुआ का था

अकबर हमीदी

अभी ज़मीन को हफ़्त आसमाँ बनाना है

अकबर हमीदी

हुए इस क़दर मोहज़्ज़ब कभी घर का मुँह न देखा

अकबर इलाहाबादी

हर इक ये कहता है अब कार-ए-दीं तो कुछ भी नहीं

अकबर इलाहाबादी

दश्त-ए-ग़ुर्बत है अलालत भी है तन्हाई भी

अकबर इलाहाबादी

ख़ुश-रंग किस क़दर ख़स-ओ-ख़ाशाक थे कभी

अकबर अली खान अर्शी जादह

नज़र आ रहे हैं जो तन्हा से हम

अजमल सिराज

हर उजाला नई सहर तो नहीं

अजमल अजमली

सितम ये है वो कभी भूल कर नहीं आया

आजिज़ मातवी

यूँ तुझ से दूर दूर रहूँ ये सज़ा न दे

आजिज़ मातवी

जहाँ न दिल को सुकून है न है क़रार मुझे

आजिज़ मातवी

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