पर्दा Poetry (page 7)
रंग उस महफ़िल-ए-तमकीं में जमाया न गया
रविश सिद्दीक़ी
कहने को सब फ़साना-ए-ग़ैब-ओ-शुहूद था
रविश सिद्दीक़ी
ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई
रतन पंडोरवी
शैख़-ए-हरम उस बुत का परस्तार हुआ है
रासिख़ अज़ीमाबादी
लाख चाहा मैं ने पर्दा सामने आया नहीं
रशीद उस्मानी
ख़ार-ओ-ख़स फेंके चमन के रास्ते जारी करे
रशीद लखनवी
जोश-ए-वहशत मेरे तलवों को ये ईज़ा भी सही
रशीद लखनवी
जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए
रशीद लखनवी
नीची नज़रों से न देखो सर-ए-महशर देखो
रसा रामपुरी
यक़ीनन है कोई माह-ए-मुनव्वर पीछे चिलमन के
रंजूर अज़ीमाबादी
दीवाना कर के मुझ को तमाशा किया बहुत
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
मिलने को यूँ तो मिलते थे कुछ लोग रोज़ ही
राज खेती
दब गईं मौजें यकायक जोश में आने के बा'द
रहमत इलाही बर्क़ आज़मी
रास्ते अपनी नज़र बदला किए
राही मासूम रज़ा
हवस-गिरफ़्ता हवाओ निगाहें नीची रखो
राही फ़िदाई
अंधराता
इक़तिदार जावेद
कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं
इक़बाल अज़ीम
कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं
इक़बाल अज़ीम
महफ़िल में उस पे रात जो तू मेहरबाँ न था
इम्दाद इमाम असर
अपने दर से जो उठाते हैं हमें
इम्दाद इमाम असर
जो मज़े आज तिरे ग़म के अज़ाबों में मिले
इमाम अाज़म
तमाशा करने वालों को ख़बर दी जा चुकी है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बिखर जाएँगे हम क्या जब तमाशा ख़त्म होगा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शब-ए-फ़ुर्क़त की तन्हाई का लम्हा
इफ़्फ़त अब्बास
लब-ओ-रुख़्सार ओ जबीं से मिलिए
इब्न-ए-सफ़ी
क्या क्या हैं गिले उस को बता क्यूँ नहीं देता
इब्न-ए-रज़ा
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
इब्न-ए-इंशा
उलझनें इतनी थीं मंज़र और पस-मंज़र के बीच
हुसैन ताज रिज़वी
इतनी सी इस जहाँ की हक़ीक़त है और बस
हुसैन सहर
मर-मिटे जब से हम उस दुश्मन-ए-दीं पर साहब
हुसैन मजरूह
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