शहर Poetry (page 86)

कुछ शफ़क़ डूबते सूरज की बचा ली जाए

अहमद शनास

न दस्तकें न सदा कौन दर पे आया है

अहमद शहरयार

हमारे शहर की रिवायतों में एक ये भी था

अहमद शहरयार

फ़क़ीर-ए-शहर भी रहा हूँ 'शहरयार' भी मगर

अहमद शहरयार

वो मर गया सदा-ए-नौहा-गर में कितनी देर है

अहमद शहरयार

ग़ुबार-ए-वक़्त के गर आर-पार देखिएगा

अहमद शहरयार

दिया नसीब में नहीं सितारा बख़्त में नहीं

अहमद शहरयार

आईना बन के अपना तमाशा दिखाएँ हम

अहमद शहरयार

काली रात के सहराओं में नूर-सिपारा लिक्खा था

अहमद सलमान

जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे

अहमद सलमान

जो दिख रहा उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शाइरी है

अहमद सलमान

बात करने का नहीं सामने आने का नहीं

अहमद रिज़वान

मन के बरगद तले अँगारों की माला भी जपी

अहमद रज़ी बछरायूनी

ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-दौराँ की तरफ़ यूँ आया

अहमद नदीम क़ासमी

तर्क-ए-दरयूज़ा

अहमद नदीम क़ासमी

रेस्तोराँ

अहमद नदीम क़ासमी

क़ानून-ए-क़ुदरत

अहमद नदीम क़ासमी

नया साल

अहमद नदीम क़ासमी

उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे

अहमद नदीम क़ासमी

तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा

अहमद नदीम क़ासमी

फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ

अहमद नदीम क़ासमी

मुदावा हब्स का होने लगा आहिस्ता आहिस्ता

अहमद नदीम क़ासमी

मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे

अहमद नदीम क़ासमी

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

अहमद नदीम क़ासमी

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

अहमद नदीम क़ासमी

हम दिन के पयामी हैं मगर कुश्ता-ए-शब हैं

अहमद नदीम क़ासमी

दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने

अहमद नदीम क़ासमी

संग उठाना तो बड़ी बात है अब शहर के लोग

अहमद मुश्ताक़

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

अहमद मुश्ताक़

ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को

अहमद मुश्ताक़

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