Ghazal Poetry (page 400)
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
निदा फ़ाज़ली
जो हो इक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता
निदा फ़ाज़ली
जो भला है उसे बुरा मत कर
निदा फ़ाज़ली
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
निदा फ़ाज़ली
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
निदा फ़ाज़ली
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे
निदा फ़ाज़ली
जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम
निदा फ़ाज़ली
जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी
निदा फ़ाज़ली
जाने वालों से राब्ता रखना
निदा फ़ाज़ली
जाने वालों से राब्ता रखना
निदा फ़ाज़ली
इंसान हैं हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
निदा फ़ाज़ली
हुए सब के जहाँ में एक जब अपना जहाँ और हम
निदा फ़ाज़ली
हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी
निदा फ़ाज़ली
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
निदा फ़ाज़ली
हर इक रस्ता अँधेरों में घिरा है
निदा फ़ाज़ली
हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
निदा फ़ाज़ली
हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए
निदा फ़ाज़ली
हर चमकती क़ुर्बत में एक फ़ासला देखूँ
निदा फ़ाज़ली
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
निदा फ़ाज़ली
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे
निदा फ़ाज़ली
गरज बरस प्यासी धरती फिर पानी दे मौला
निदा फ़ाज़ली
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा
निदा फ़ाज़ली
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
निदा फ़ाज़ली
दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे
निदा फ़ाज़ली
दुआ सलाम में लिपटी ज़रूरतें माँगे
निदा फ़ाज़ली
दो चार गाम राह को हमवार देखना
निदा फ़ाज़ली
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही
निदा फ़ाज़ली
दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती
निदा फ़ाज़ली
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
निदा फ़ाज़ली
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
निदा फ़ाज़ली