Ghazal Poetry (page 402)

सपन कितना सलोना चाहती थी

नीना सहर

फिर तिरे रेशमी लब मुझ को मनाने आए

नीना सहर

फिर तिरा इंतिज़ार देखेंगे

नीना सहर

नैन तो बार बार भर जाएँ

नीना सहर

मुख़्तलिफ़ हैं मिरी बहार के रंग

नीना सहर

क्या करिश्मा था ख़ुदाया देर तक

नीना सहर

कोई मो'जिज़ा हुआ है मिरी बे-ख़ुदी से आगे

नीना सहर

कैसे होती है शब की सहर देखते

नीना सहर

जाने अब खो गया किधर पानी

नीना सहर

''हर तमन्ना दिल से रुख़्सत हो गई''

नीना सहर

घर से निकले थे आरज़ू कर के

नीना सहर

इक फ़क़त उस के रूठ जाने पर

नीना सहर

बहुत सोचा किए क्या ज़िंदगी है

नीना सहर

मिरी मोहब्बत भी नीलगूं है

नील अहमद

मैं अपने आप को रोकूँ कहाँ तक

नील अहमद

महव-ए-रक़्स-ए-विसाल था क्या था

नील अहमद

नज़र जब से किसी की मेहरबाँ मा'लूम होती है

नाज़नीन बेगम नाज़

दिलों में ख़ार लबों पर गिला मिलेगा मुझे

नज़्मी सिकंदराबादी

अगर ज़बाँ से न अश्क-ए-रवाँ से गुज़रेगा

नज़्मी सिकंदराबादी

यूँ तो न तेरे जिस्म में हैं ज़ीनहार हाथ

नज़्म तबा-तबाई

यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़

नज़्म तबा-तबाई

ये हुआ मआल हुबाब का जो हवा में भर के उभर गया

नज़्म तबा-तबाई

ये आह-ए-बे-असर क्या हो ये नख़्ल-ए-बे-समर क्या हो

नज़्म तबा-तबाई

उड़ा कर काग शीशे से मय-ए-गुल-गूँ निकलती है

नज़्म तबा-तबाई

तन्हा नहीं हूँ गर दिल-ए-दीवाना साथ है

नज़्म तबा-तबाई

सुब्हा है ज़ुन्नार क्यूँ कैसी कही

नज़्म तबा-तबाई

संग-ए-जफ़ा का ग़म नहीं दस्त-ए-तलब का डर नहीं

नज़्म तबा-तबाई

पुर्सिश जो होगी तुझ से जल्लाद क्या करेगा

नज़्म तबा-तबाई

फिरी हुई मिरी आँखें हैं तेग़-ज़न की तरफ़

नज़्म तबा-तबाई

नदामत है बना कर इस चमन में आशियाँ मुझ को

नज़्म तबा-तबाई