Ghazal Poetry (page 404)
धड़कनें मोहब्बत की दिल-नशीन ख़ामोशी
नाज़िर वहीद
जो दाढ़ी मोंछ इधर ग़ाएब तो चोटी है उधर ग़ाएब
नाज़िर टोंकी
तलातुम-ख़ेज़ मंज़र हो गई हैं
नाज़िर सिद्दीक़ी
शाख़ पे चिड़िया गाती है
नाज़िर सिद्दीक़ी
सवाद-ए-शाम-ए-ग़म में यूँ तो देर तक जला चराग़
नाज़िर सिद्दीक़ी
मक़्तल से मेरा कासा-ए-सर कौन ले गया
नाज़िर सिद्दीक़ी
मंज़िल के दूर दूर तक आसार तक भी नहीं
नाज़िर सिद्दीक़ी
कर लिया महफ़ूज़ ख़ुद को राएगाँ होते हुए
नाज़िर सिद्दीक़ी
घर से अब बाहर निकलने में भी घबराते हैं हम
नाज़िर सिद्दीक़ी
फ़ज़ा-ए-तीरा-शबी का हिसाब करना है
नाज़िर सिद्दीक़ी
फ़सील-ए-जाँ पे रक्खी थी न बाम-ओ-दर पे रक्खी थी
नाज़िर सिद्दीक़ी
आसमाँ का न रहा और ज़मीं का न रहा
नज़ीर फ़तेहपूरी
सुकूत-ए-लब को शिकस्ता-दिली समझते हैं
नाजिर अल हुसैनी
सुब्ह-ए-दरख़्शाँ अपने वतन में ख़्वाब-ए-परेशाँ अपने वतन में
नाजिर अल हुसैनी
है दर्द में डूबी हुई तहरीर की आवाज़
नाजिर अल हुसैनी
ये दौड़-धूप ब-हर-सुब्ह-ओ-शाम किस के लिए
नाज़िम सुल्तानपूरी
वो एक पल को मुझे इतना सच लगा था कि बस
नाज़िम सुल्तानपूरी
बड़ी तमन्ना है जाऊँ सू-ए-सितम किसी दिन
नाज़िम सुल्तानपूरी
यक़ीं को दार से हासिल किया है
नाज़िम नक़वी
वफ़ा करते उसे देखा नहीं है
नाज़िम नक़वी
शाम अच्छी है न सहर अच्छी
नाज़िम नक़वी
शहर मेरी मजबूरी गाँव मेरी आदत है
नाज़िम नक़वी
सारा क़िस्सा तमाम कर लीजे
नाज़िम नक़वी
मैं तंग-दस्ती-ए-मोहलत से इतना चाहता हूँ
नाज़िम नक़वी
कुछ नहीं है मगर है ये दुनिया
नाज़िम नक़वी
हर एक शय से मोहब्बत की रिश्ता-दारी रख
नाज़िम नक़वी
देखिए किस को रास आते हैं
नाज़िम नक़वी
बढ़ा दो दर्द की लौ और कम है मेरे लिए
नाज़िम नक़वी
सुना दी किस ने रूदाद-ए-ग़म-ए-दिल कोहसारों को
नाज़िम बरेलवी
क्या है मेरे दिल की हालत वाक़ई कैसे कहूँ
नाज़िम बरेलवी