Ghazal Poetry (page 405)

अश्क चश्म-ए-बुत-ए-बे-जाँ से निकल सकता है

नाज़िम बरेलवी

कली कली में निहाँ हिचकिचाहटें पहचान

नज़ीर तबस्सुम

ये जो इंसाँ ख़ुदा का है शहकार

नज़ीर सिद्दीक़ी

ये जो इंसाँ ख़ुदा का है शहकार

नज़ीर सिद्दीक़ी

लज़्ज़त-ए-ख़्वाब दे गए हुस्न-ए-ख़याल दे गए

नज़ीर सिद्दीक़ी

किस क़ुव्वत-ए-बे-दर्द का इज़हार है दुनिया

नज़ीर सिद्दीक़ी

ख़ुद-फ़रेबी ने बे-शक सहारा दिया और तबीअ'त ब-ज़ाहिर बहलती रही

नज़ीर सिद्दीक़ी

जिन के गुनाह मेरी नज़र से निहाँ नहीं

नज़ीर सिद्दीक़ी

हवस की आग बुझी दिल की तिश्नगी है वही

नज़ीर सिद्दीक़ी

हर शख़्स बन गया है ख़ुदा तेरे शहर में

नज़ीर सिद्दीक़ी

हालात अब तो इतने दुश्वार हो गए हैं

नज़ीर सिद्दीक़ी

चश्म-ए-नम कुछ भी नहीं और शेर-ए-तर कुछ भी नहीं

नज़ीर सिद्दीक़ी

बदल गई है कुछ ऐसी हवा ज़माने की

नज़ीर सिद्दीक़ी

और ही वो लोग हैं जिन को है यज़्दाँ की तलाश

नज़ीर सिद्दीक़ी

आँखों में बे-रुख़ी नहीं दिल में कशीदगी नहीं

नज़ीर सिद्दीक़ी

ज़ख़्म-ए-उल्फ़त अयाँ नहीं होता

नज़ीर रामपुरी

वो नहीं है तो ज़िंदगी कैसी

नज़ीर रामपुरी

खुल गया शायद भरम ऐ दिल जुनूँ के राज़ का

नज़ीर रामपुरी

हिज्र की शब में बयाँ किस से मैं रूदाद करूँ

नज़ीर रामपुरी

ग़म है खाने को अश्क पीने को

नज़ीर रामपुरी

ये तेरे मिरे हाथ

नज़ीर क़ैसर

वो बिस्तर में पड़ी रही

नज़ीर क़ैसर

वो आया तो इतना प्यार देगा

नज़ीर क़ैसर

तुझ को लिखना है तो ऐसा कोई सफ़हा लिख दे

नज़ीर क़ैसर

तंग हुई जाती है ज़मीं इंसानों पर

नज़ीर क़ैसर

शाख़ में सब्ज़ा धूप में साया वापस आया

नज़ीर क़ैसर

साहिल की रेत चाँद के मुँह पर न डालिए

नज़ीर क़ैसर

रात किनारा दरिया दिन

नज़ीर क़ैसर

प्याले में जो पानी है

नज़ीर क़ैसर

पुरानी मिट्टी से पैकर नया बनाऊँ कोई

नज़ीर क़ैसर