Ghazal Poetry (page 407)

बस और क्या कहूँ इस सिलसिला में तौबा है

नज़ीर मुज़फ़्फ़रपुरी

उमँड रही हैं घटाएँ कि ज़ुल्फ़ बरहम है

नज़ीर मोहसिन

कहीं ठहर के न रह जाएँ धड़कनें दिल की

नज़ीर मोहसिन

फ़ज़ा-ए-लाला-ओ-गुल में वो ताज़गी न रही

नज़ीर मोहसिन

काला तिल निस्वारी आँखें

नज़ीर जालंधरी

ये करें और वो करें ऐसा करें वैसा करें

नज़ीर बनारसी

ये जल्वा-गह-ए-ख़ास है कुछ आम नहीं है

नज़ीर बनारसी

ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी

नज़ीर बनारसी

यहाँ की फ़िक्र वहाँ का ख़याल रक्खा है

नज़ीर बनारसी

वो जो बिछड़े मौत याद आने लगी

नज़ीर बनारसी

तुम नैन के दोनों पट मेरे लिए वा रखना

नज़ीर बनारसी

तूफ़ाँ से थपेड़ों के सहारे निकल आए

नज़ीर बनारसी

सुना है कि उन से मुलाक़ात होगी

नज़ीर बनारसी

निगाह ओ दिल भी क़दम की तरह मिला के चले

नज़ीर बनारसी

मस्जिद-ओ-मंदिर कलीसा सब में जाना चाहिए

नज़ीर बनारसी

कितनी शर्मीली लजीली है हवा बरसात की

नज़ीर बनारसी

जो ग़ज़ल महलों से चल कर झोंपड़ों तक आ गई

नज़ीर बनारसी

जब से वो कह के गए हैं कि अभी आते हैं

नज़ीर बनारसी

हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते

नज़ीर बनारसी

हुए मुझ से जिस घड़ी तुम जुदा तुम्हें याद हो कि न याद हो

नज़ीर बनारसी

हैं यूँ मस्त आँखों में डोरे गुलाबी

नज़ीर बनारसी

इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ

नज़ीर बनारसी

एक झोंका इस तरह ज़ंजीर-ए-दर खड़का गया

नज़ीर बनारसी

दिन ढला जाता है शाम आती है घबराता हूँ मैं

नज़ीर बनारसी

बद-गुमानी को बढ़ा कर तुम ने ये क्या कर दिया

नज़ीर बनारसी

और तो कुछ न हुआ पी के बहक जाने से

नज़ीर बनारसी

अक्सर इस तरह से भी रात बसर होती है

नज़ीर बनारसी

आस ही से दिल में पैदा ज़िंदगी होने लगी

नज़ीर बनारसी

ये हैं तैराक मगर हाल ये इन के देखे

नज़ीर बाक़री

याद नहीं क्या क्या देखा था सारे मंज़र भूल गए

नज़ीर बाक़री