Ghazal Poetry (page 409)

उधर उस की निगह का नाज़ से आ कर पलट जाना

नज़ीर अकबराबादी

तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिब

नज़ीर अकबराबादी

टुक होंट हिलाऊँ तो ये कहता है न बक बे

नज़ीर अकबराबादी

तुझे कुछ भी ख़ुदा का तर्स है ऐ संग-दिल तरसा

नज़ीर अकबराबादी

तो ही न सुने जब दिल-ए-नाशाद की फ़रियाद

नज़ीर अकबराबादी

थी छोटी उस के मुखड़े पर कल ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल और तरह

नज़ीर अकबराबादी

तिरी क़ुदरत की क़ुदरत कौन पा सकता है क्या क़ुदरत

नज़ीर अकबराबादी

तिरे मरीज़ को ऐ जाँ शिफ़ा से क्या मतलब

नज़ीर अकबराबादी

तेरे भी मुँह की रौशनी रात गई थी मह से मिल

नज़ीर अकबराबादी

तन पर उस के सीम फ़िदा और मुँह पर मह दीवाना है

नज़ीर अकबराबादी

तदबीर हमारे मिलने की जिस वक़्त कोई ठहराओगे तुम

नज़ीर अकबराबादी

सुनिए ऐ जाँ कभी असीर की अर्ज़

नज़ीर अकबराबादी

शोर आहों का उठा नाला फ़लक सा निकला

नज़ीर अकबराबादी

शेवा-ए-नाज़ होश छल जाना

नज़ीर अकबराबादी

शहर-ए-दिल आबाद था जब तक वो शहर-आरा रहा

नज़ीर अकबराबादी

शब-ए-मह में देख उस का वो झमक झमक के चलना

नज़ीर अकबराबादी

सेहन-ए-गुलशन में चली फिर के हवा बिस्मिल्लाह

नज़ीर अकबराबादी

सज़ा-वार-ए-अरे-आरे हुए हैं

नज़ीर अकबराबादी

सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की क्यारी है

नज़ीर अकबराबादी

साक़ी ज़ुहूर-ए-सुब्ह ओ तरश्शह है नूर का

नज़ीर अकबराबादी

साक़ी ये पिला उस को जो हो जाम से वाक़िफ़

नज़ीर अकबराबादी

साक़ी शराब है तो ग़नीमत है अब की अब

नज़ीर अकबराबादी

सनम के कूचे में छुप के जाना अगरचे यूँ है ख़याल दिल का

नज़ीर अकबराबादी

सनम के कूचे में छुप के जाना अगरचे यूँ है ख़याल दिल का

नज़ीर अकबराबादी

सहर जो निकला मैं अपने घर से तो देखा इक शोख़ हुस्न वाला

नज़ीर अकबराबादी

सहर हम ने चमन-अंदर अजब देखा कल इक दिलबर

नज़ीर अकबराबादी

सफ़ाई उस की झलकती है गोरे सीने में

नज़ीर अकबराबादी

सब ठाठ ये इक बूँद से क़ुदरत की बना है

नज़ीर अकबराबादी

रुत्बा कुछ आशिक़ी में न कम है फ़क़ीर का

नज़ीर अकबराबादी

रुख़ परी चश्म परी ज़ुल्फ़ परी आन परी

नज़ीर अकबराबादी