Ghazal Poetry (page 410)

रक्खी हरगिज़ न तिरे रख ने रुख़-ए-बदर की क़द्र

नज़ीर अकबराबादी

रखता है सदा होंट को जूँ गुल की कली चुप

नज़ीर अकबराबादी

रखता है गो क़दीम से बुनियाद आगरा

नज़ीर अकबराबादी

रहे जो शब को हम उस गुल के सात कोठे पर

नज़ीर अकबराबादी

क़त्ल पर बाँध चुका वो बुत-ए-गुमराह मियाँ

नज़ीर अकबराबादी

क़स्र-ए-रंगीं से गुज़र बाग़-ओ-गुलिस्ताँ से निकल

नज़ीर अकबराबादी

क़मर ने रात कहा उस की देख कर सूरत

नज़ीर अकबराबादी

फिर इस तरफ़ वो परी-रू झमकता आता है

नज़ीर अकबराबादी

फिर इस तरफ़ वो परी-रू झमकता आता है

नज़ीर अकबराबादी

पाया मज़ा ये हम ने अपनी निगह लड़ी का

नज़ीर अकबराबादी

निकले हो किस बहार से तुम ज़र्द-पोश हो

नज़ीर अकबराबादी

निगह के सामने उस का जूँही जमाल हुआ

नज़ीर अकबराबादी

नीची निगह की हम ने तो उस ने मुँह को छुपाना छोड़ दिया

नज़ीर अकबराबादी

नज़र पड़ा इक बुत-ए-परी-वश निराली सज-धज नई अदा का

नज़ीर अकबराबादी

नामा-ए-यार जो सहर पहुँचा

नज़ीर अकबराबादी

ना-ख़ुश दिखा के जिस को नाज़-ओ-इताब कीजे

नज़ीर अकबराबादी

नहीं याँ बैठते जो एक दम तुम

नज़ीर अकबराबादी

नहीं हवा में ये बू नाफ़ा-ए-ख़ुतन की सी

नज़ीर अकबराबादी

न उस के नाम से वाक़िफ़ न उस की जा मा'लूम

नज़ीर अकबराबादी

न टोको दोस्तो उस की बहार नाम-ए-ख़ुदा

नज़ीर अकबराबादी

न सुर्ख़ी ग़ुंचा-ए-गुल में तिरे दहन की सी

नज़ीर अकबराबादी

न मैं दिल को अब हर मकाँ बेचता हूँ

नज़ीर अकबराबादी

न मह ने कौंद बिजली की न शोले का उजाला है

नज़ीर अकबराबादी

न लज़्ज़तें हैं वो हँसने में और न रोने में

नज़ीर अकबराबादी

न दिल में सब्र न अब दीदा-ए-पुर-आब में ख़्वाब

नज़ीर अकबराबादी

न आया आज भी सब खेल अपना मिट्टी है

नज़ीर अकबराबादी

मुंतज़िर उस के दिला ता-ब-कुजा बैठना

नज़ीर अकबराबादी

मुँह से पर्दा न उठे साहब-ए-मन याद रहे

नज़ीर अकबराबादी

मुझे इस झमक से आया नज़र इक निगार-ए-रा'ना

नज़ीर अकबराबादी

मिज़्गाँ वो झपकता है अब तीर है और मैं हूँ

नज़ीर अकबराबादी