Ghazal Poetry (page 408)
रोज़ ख़्वाबों में नए रंग भरा करता था
नज़ीर बाक़री
मैं एक क़र्ज़ हूँ सर से उतार दे मुझ को
नज़ीर बाक़री
कुछ देर सादगी के तसव्वुर से हट के देख
नज़ीर बाक़री
कौन पहचाने मुझे शब भर तो ख़तरों में रहा
नज़ीर बाक़री
जब ज़बानों में यहाँ सोने के ताले पड़ गए
नज़ीर बाक़री
जब न आने की क़सम आप ने खा रक्खी थी
नज़ीर बाक़री
धुआँ बना के फ़ज़ा में उड़ा दिया मुझ को
नज़ीर बाक़री
अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे
नज़ीर बाक़री
ज़र्रा ज़र्रा कर्बला मंज़र-ब-मंज़र तिश्नगी
नज़ीर आज़ाद
सवार-ए-वक़्त है वो फ़ासलों से आगे है
नज़ीर आज़ाद
क्या रात कटी अपनी उलझते हुए जाँ से
नज़ीर आज़ाद
फ़ासला यूँ तो बस मकाँ भर था
नज़ीर आज़ाद
ज़ाहिदो रौज़ा-ए-रिज़वाँ से कहो इश्क़ अल्लाह
नज़ीर अकबराबादी
ये जो उठती कोंपल है जब अपना बर्ग निकालेगी
नज़ीर अकबराबादी
ये जो गुल-रू निगार हँसते हैं
नज़ीर अकबराबादी
ये जवाहिर-ख़ाना-ए-दुनिया जो है बा-आब-ओ-ताब
नज़ीर अकबराबादी
ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा है
नज़ीर अकबराबादी
ये हस्ब-ए-अक़्ल तो कोई नहीं सामान मिलने का
नज़ीर अकबराबादी
ये गिला दिल से तो हरगिज़ नहीं जाना साहब
नज़ीर अकबराबादी
ये दिल-ए-नादाँ हमारा भी अजब दीवाना था
नज़ीर अकबराबादी
ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला है
नज़ीर अकबराबादी
यार ने हम को अगर रुस्वा कहा अच्छा कहा
नज़ीर अकबराबादी
याँ तो कुछ अपनी ख़ुशी से नहीं हम आए हुए
नज़ीर अकबराबादी
यक-ब-यक होगी सियाही इस क़दर जाती रही
नज़ीर अकबराबादी
वो सनम जो मेहर-एज़ार है उसे हम से मिलने में आर है
नज़ीर अकबराबादी
वो चाँदनी में जो टुक सैर को निकलते हैं
नज़ीर अकबराबादी
उस के शरार-ए-हुस्न ने शोअ'ला जो इक दिखा दिया
नज़ीर अकबराबादी
उस के बाला है अब वो कान के बीच
नज़ीर अकबराबादी
उसी की ज़ात को है दाइमन सबात-ओ-क़याम
नज़ीर अकबराबादी
उसी का देखना है ढानता दिल
नज़ीर अकबराबादी