Ghazal Poetry (page 406)

पीछे मुड़ के देखना अच्छा लगा

नज़ीर क़ैसर

पहले इंकार बहुत करता है

नज़ीर क़ैसर

नींद जब ख़्वाब को पुकारती है

नज़ीर क़ैसर

मिट्टी से कुछ ख़्वाब उगाने आया हूँ

नज़ीर क़ैसर

मिट्टी पे कोई नक़्श भी उभरा न रहेगा

नज़ीर क़ैसर

मेरी आँखों को मिरी शक्ल दिखा दे कोई

नज़ीर क़ैसर

मैं राख होता गया और चराग़ जलता रहा

नज़ीर क़ैसर

ख़्वाब क्या था जो मिरे सर में रहा

नज़ीर क़ैसर

ख़ाक उगाती हैं सूरतें क्या क्या

नज़ीर क़ैसर

कौन हूँ क्यूँ ज़िंदा हूँ सोचता रहता हूँ

नज़ीर क़ैसर

कैसा तारा टूटा मुझ में

नज़ीर क़ैसर

कभी हँस कर कभी आँसू बहा कर देख लेता हूँ

नज़ीर क़ैसर

जागते हैं सोते हैं

नज़ीर क़ैसर

जब खुला बादबान हाथों में

नज़ीर क़ैसर

हर नक़्श है वजूद-ए-फ़ना मेरे सामने

नज़ीर क़ैसर

घरों में सब्ज़ा छतों पर गुल-ए-सहाब लिए

नज़ीर क़ैसर

गलियाँ उदास खिड़कियाँ चुप दर खुले हुए

नज़ीर क़ैसर

दुआ का फूल पड़ा रह गया है थाली में

नज़ीर क़ैसर

दिया जलाया दोनों ने

नज़ीर क़ैसर

दिल-तंग हूँ मकान के अंदर पड़ा हुआ

नज़ीर क़ैसर

चाँद को पूरा होने दो

नज़ीर क़ैसर

आँखें किस का खोज लगाती रहती हैं

नज़ीर क़ैसर

आज दरीचे में वो आना भूल गया

नज़ीर क़ैसर

वो शे'र सुन के मिरा हो गया दिवाना क्या

नज़ीर नज़र

रहबरी के लिए रहनुमा छोड़ दो

नज़ीर नज़र

क्या तुम ने भी है कल रतजगा किया

नज़ीर नज़र

जीत कर भी फिर से हारी ज़िंदगी

नज़ीर नज़र

अगर वो हादिसा फिर से हुआ तो

नज़ीर नज़र

जो कुछ नुमायाँ हुआ अल-अमाँ मआज़-अल्लाह

नज़ीर मुज़फ़्फ़रपुरी

गुम-ब-ख़ुद बेगाना-ए-हर-ऐश-ए-महफ़िल हो गए

नज़ीर मुज़फ़्फ़रपुरी