Ghazal Poetry (page 411)

मियाँ दिल तुझे ले चले हुस्न वाले

नज़ीर अकबराबादी

मिला मुझ से वो आज चंचल छबीला

नज़ीर अकबराबादी

मिल कर सनम से अपने हंगाम-ए-दिल-कुशाई

नज़ीर अकबराबादी

मिरा ख़त है जहाँ यारो वो रश्क-ए-हूर ले जाना

नज़ीर अकबराबादी

मिरा दिल है मुश्ताक़ उस गुल-बदन का

नज़ीर अकबराबादी

मानी ने जो देखा तिरी तस्वीर का नक़्शा

नज़ीर अकबराबादी

महफ़िल में हम थे इस तरफ़ वो शोख़ चंचल उस तरफ़

नज़ीर अकबराबादी

मह है अगर जू-ए-शीर तुम भी ज़री-पोश हो

नज़ीर अकबराबादी

लो न हँस हँस के तुम अग़्यार से गुल-दस्तों से

नज़ीर अकबराबादी

लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता था

नज़ीर अकबराबादी

लेता है जान मेरी तो में सर-ब-दस्त हूँ

नज़ीर अकबराबादी

ले के दिल मेहर से फिर रस्म-ए-जफ़ा-कारी क्या

नज़ीर अकबराबादी

लावे ख़ातिर में हमारे दिल को वो मग़रूर क्या

नज़ीर अकबराबादी

क्यूँ न हो बाम पे वो जल्वा-नुमा तीसरे दिन

नज़ीर अकबराबादी

क्या नाम-ए-ख़ुदा अपनी भी रुस्वाई है कम-बख़्त

नज़ीर अकबराबादी

क्या कासा-ए-मय लीजिए इस बज़्म में ऐ हम-नशीं

नज़ीर अकबराबादी

क्या कहीं दुनिया में हम इंसान या हैवान थे

नज़ीर अकबराबादी

क्या दिन थे वो जो वाँ करम-ए-दिल-बराना था

नज़ीर अकबराबादी

क्या अदा किया नाज़ है क्या आन है

नज़ीर अकबराबादी

कुलाल-ए-गर्दूं अगर जहाँ में जो ख़ाक मेरी का जाम करता

नज़ीर अकबराबादी

कुछ तो हो कर दू-बदू कुछ डरते डरते कह दिया

नज़ीर अकबराबादी

कुछ और तो नहीं हमें इस का ओजब है अब

नज़ीर अकबराबादी

किसी ने रात कहा उस की देख कर सूरत

नज़ीर अकबराबादी

किस के लिए कीजिए जामा-ए-दीबा-तलब

नज़ीर अकबराबादी

किधर है आज इलाही वो शोख़ छल-बलिया

नज़ीर अकबराबादी

की तलब इक शह ने कुछ पंद अज़-हकीम-ए-नुक्ता-दाँ

नज़ीर अकबराबादी

खोली जो टुक ऐ हम-नशीं उस दिल-रुबा की ज़ुल्फ़ कल

नज़ीर अकबराबादी

खींच कर इस माह-रू को आज याँ लाई है रात

नज़ीर अकबराबादी

ख़याल-ए-यार सदा चश्म-ए-नम के साथ रहा

नज़ीर अकबराबादी

कौन याँ साथ लिए ताज-ओ-सरीर आया है

नज़ीर अकबराबादी