Ghazal Poetry (page 413)
जब उस का इधर हम गुज़र देखते हैं
नज़ीर अकबराबादी
जब मैं सुना कि यार का दिल मुझ से हट गया
नज़ीर अकबराबादी
जब हम-नशीं हमारा भी अहद-ए-शबाब था
नज़ीर अकबराबादी
जब आँख उस सनम से लड़ी तब ख़बर पड़ी
नज़ीर अकबराबादी
जाँ भी ब-जाँ है हिज्र में और दिल फ़िगार भी
नज़ीर अकबराबादी
इश्क़ फिर रंग वो लाया है कि जी जाने है
नज़ीर अकबराबादी
इश्क़ का मारा न सहरा ही में कुछ चौपट पड़ा
नज़ीर अकबराबादी
ईसा की क़ुम से हुक्म नहीं कम फ़क़ीर का
नज़ीर अकबराबादी
इंकार हम से ग़ैर से इक़रार बस जी बस
नज़ीर अकबराबादी
इधर यार जब मेहरबानी करेगा
नज़ीर अकबराबादी
हुस्न उस शोख़ का अहा-हाहा
नज़ीर अकबराबादी
हूँ तेरे तसव्वुर में मिरी जाँ हमा-तन-चश्म
नज़ीर अकबराबादी
हम में भी और उन्हों में पहले जो यारियाँ थीं
नज़ीर अकबराबादी
हम देखें किस दिन हुस्न ऐ दिल उस रश्क-ए-परी का देखेंगे
नज़ीर अकबराबादी
हम अश्क-ए-ग़म हैं अगर थम रहे रहे न रहे
नज़ीर अकबराबादी
हम ऐसे कब थे कि ख़ुद बदौलत यहाँ भी करते क़दम नवाज़िश
नज़ीर अकबराबादी
हुई शक्ल अपनी ये हम-नशीं जो सनम को हम से हिजाब है
नज़ीर अकबराबादी
हुई शक्ल अपनी ये हम-नशीं जो सनम को हम से हिजाब है
नज़ीर अकबराबादी
हुए ख़ुश हम एक निगार से हुए शाद उस की बहार से
नज़ीर अकबराबादी
हुए ख़ुश हम एक निगार से हुए शाद उस की बहार से
नज़ीर अकबराबादी
हुआ ख़ुर्शीद के देखे से दूना इज़्तिराब अपना
नज़ीर अकबराबादी
होश-ओ-ख़िरद को कर दिया तर्क और शग़्ल जो कुछ था छोड़ दिया
नज़ीर अकबराबादी
हो क्यूँ न तिरे काम में हैरान तमाशा
नज़ीर अकबराबादी
हो कुछ आसेब तो वाँ चाहिए गंडा ता'वीज़
नज़ीर अकबराबादी
हो किस तरह न हम को हर दम हवा-ए-मतलब
नज़ीर अकबराबादी
हो के मह वो तो किसी और का हाला निकला
नज़ीर अकबराबादी
हर आन तुम्हारे छुपने से ऐसा ही अगर दुख पाएँगे हम
नज़ीर अकबराबादी
हँसे रोए फिरे रुस्वा हुए जागे बंधे छूटे
नज़ीर अकबराबादी
हैं दम के साथ इशरत ओ उसरत हज़ार-हा
नज़ीर अकबराबादी
है अब तो ये धुन उस से मैं आँख लड़ा लूँगा
नज़ीर अकबराबादी