Ghazal Poetry (page 414)
है अब तो वो हमें उस सर्व-ए-सीम-बर की तलब
नज़ीर अकबराबादी
गुलज़ार है दाग़ों से यहाँ तन-बदन अपना
नज़ीर अकबराबादी
गुलज़ार है दाग़ों से यहाँ तन-बदन अपना
नज़ीर अकबराबादी
गर हम ने दिल सनम को दिया फिर किसी को क्या
नज़ीर अकबराबादी
गर ऐश से इशरत में कटी रात तो फिर क्या
नज़ीर अकबराबादी
गले से दिल के रही यूँ है ज़ुल्फ़-ए-यार लिपट
नज़ीर अकबराबादी
गए हम जो उल्फ़त की वाँ राह करने
नज़ीर अकबराबादी
दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम
नज़ीर अकबराबादी
दुनिया है इक निगार-ए-फरेबंदा जल्वा-गर
नज़ीर अकबराबादी
दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है
नज़ीर अकबराबादी
दिया जो साक़ी ने साग़र-ए-मय दिखा के आन इक हमें लबालब
नज़ीर अकबराबादी
दिल यार की गली में कर आराम रह गया
नज़ीर अकबराबादी
दिल ठहरा एक तबस्सुम पर कुछ और बहा ऐ जान नहीं
नज़ीर अकबराबादी
दिल न लो दिल का ये लेना है न इख़्फ़ा होगा
नज़ीर अकबराबादी
दिल को ले कर हम से अब जाँ भी तलब करते हैं आप
नज़ीर अकबराबादी
दिल को चश्म-ए-यार ने जब जाम-ए-मय अपना दिया
नज़ीर अकबराबादी
दिल हम ने जो चश्म-ए-बुत-ए-बेबाक से बाँधा
नज़ीर अकबराबादी
दिल हर घड़ी कहता है यूँ जिस तौर से अब हो सके
नज़ीर अकबराबादी
दिखा कर इक नज़र दिल को निहायत कर गया बेकल
नज़ीर अकबराबादी
धुआँ कलेजे से मेरे निकला जला जो दिल बस कि रश्क खा कर
नज़ीर अकबराबादी
धुआँ कलेजे से मेरे निकला जला जो दिल बस कि रश्क खा कर
नज़ीर अकबराबादी
देख ले जो आलम उस के हुस्न-ए-बाला-दस्त का
नज़ीर अकबराबादी
देख कर कुर्ती गले में सब्ज़ धानी आप की
नज़ीर अकबराबादी
देख कर कुर्ते गले में सब्ज़ धानी आप की
नज़ीर अकबराबादी
देख अक़्द-ए-सुरय्या हमें अंगूर की सूझी
नज़ीर अकबराबादी
दरिया ओ कोह ओ दश्त ओ हवा अर्ज़ और समा
नज़ीर अकबराबादी
दामान-ओ-कनार अश्क से कब तर न हुए आह
नज़ीर अकबराबादी
चितवन में शरारत है और सीन भी चंचल है
नज़ीर अकबराबादी
चितवन की कहूँ कि इशारात की गर्मी
नज़ीर अकबराबादी
चितवन दुरुस्त सीन बजा बातें ठीक-ठीक
नज़ीर अकबराबादी