Ghazal Poetry (page 416)

पुराने अक्स कर के रद हमारे

नज़र जावेद

हम यूँही बिखरे नहीं हर-सू ख़स-ओ-ख़ाशाक में

नज़र जावेद

अपने होने की अर्ज़ानी ख़त्म हुई

नज़र जावेद

ज़बाँ पर शिकवा-ए-दार-ओ-रसन लाया नहीं जाता

नज़र बर्नी

याद-ए-माज़ी ये क्या किया तू ने

नज़र बर्नी

तुम को नहीं है याद अभी कल की बात है

नज़र बर्नी

न हम ने आँख लड़ाई न ख़्वाब में देखा

नज़र बर्नी

लेता हूँ तेरा नाम हर इक नाम से पहले

नज़र बर्नी

जुनून-ए-शौक़ में महव-ए-तमाशा हो गए हम तुम

नज़र बर्नी

इश्क़ की दास्तान क्या कहिए

नज़र बर्नी

हुस्न को बे-नक़ाब होने दो

नज़र बर्नी

है अब तो हसीनाओं का हल्क़ा मिरे आगे

नज़र बर्नी

ग़म का हामिल न कुछ ख़ुशी का है

नज़र बर्नी

फ़ुर्क़त का फ़ुसूँ फैल गया शाम से पहले

नज़र बर्नी

बे-ज़बानी ज़बान होती है

नज़र बर्नी

अपने अश्कों की ये बरसात किसे पेश करूँ

नज़र बर्नी

अजब इक वक़्त गुलशन में ये पैग़ाम-ए-बहार आया

नज़र बर्नी

अब हस्ती-ए-ख़राब का आलम सँवर गया

नज़र बर्नी

आँखों को अश्क-बार किया क्या बुरा किया

नज़र बर्नी

ज़वाल-ए-अज़्मत-ए-इंसाँ का मर्सिया हूँ मैं

नाज़ क़ादरी

तिलिस्म-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल तक था

नाज़ क़ादरी

सुकूत टूटने वाला है हादसा होगा

नाज़ क़ादरी

सुकूँ न था मगर इतना भी इंतिशार न था

नाज़ क़ादरी

सहन-ए-एहसास में इक नक़्श निहाँ था पहले

नाज़ क़ादरी

सच है जब भी कोई हर्फ़ उस की ज़बाँ से निकला

नाज़ क़ादरी

फिर सियह-पोश हुई शाम नज़र में रखना

नाज़ क़ादरी

न वो शुऊर की लौ है न वो नज़र का चराग़

नाज़ क़ादरी

न कोई तीर न कोई कमान बाक़ी है

नाज़ क़ादरी

ख़्वाह पत्थर ख़्वाह शीशा आदमी

नाज़ क़ादरी

ख़ुश-रंग आसमान उड़ा ले गई हवा

नाज़ क़ादरी