Ghazal Poetry (page 417)

ख़िज़ाँ से जोड़ के रिश्ता बहार का कोई

नाज़ क़ादरी

कर्बला का रास्ता रौशन हुआ

नाज़ क़ादरी

कभी हवा कभी बिजली के हम-रिकाब हुआ

नाज़ क़ादरी

जो सलीब-ए-शब पे गूँजे वो सदा कहिए मुझे

नाज़ क़ादरी

हर एक सम्त उदासी की तितलियाँ जागीं

नाज़ क़ादरी

हादिसा ऐसा भी ज़ेर-ए-आसमाँ होना ही था

नाज़ क़ादरी

गुनाह-गार-ए-वफ़ा लाएक़-ए-सज़ा लिख दो

नाज़ क़ादरी

गोद में ज़र्रात की सर अपना रख कर सो गया

नाज़ क़ादरी

गहे मकाँ से सुनी गाह-ए-ला-मकाँ से सुनी

नाज़ क़ादरी

बर्फ़ के फूल खिले धूप के दाने निकले

नाज़ क़ादरी

बराए नाम सही हासिल-ए-तलब ठहरा

नाज़ क़ादरी

फूलने-फलने लगे हैं साहब-ए-ज़र और भी

नाज़ ख़यालवी

पहले जैसा रंग-ए-बाम-ओ-दर नहीं लगता मुझे

नाज़ ख़यालवी

दिल का हर ज़ख़्म जवाँ हो तो ग़ज़ल होती है

नाज़ ख़यालवी

बहुत अर्सा गुनहगारों में पैग़मबर नहीं रहते

नाज़ ख़यालवी

अज़ाब-ए-हसरत-ओ-आलाम से निकल जाओ

नाज़ ख़यालवी

जैसे जैसे आलम-ए-इम्काँ बदलता जाएगा

नाज़ लाइलपूरी

आँचल जो ढलकता है उन का कभी शानों से

नाज़ लाइलपूरी

तुझ को सोचूँ मैं सू-ब-सू हो कर

नाज़ बट

तिरा नसीब बनूँ तेरी चाहतों में रहूँ

नाज़ बट

पहले दुख दर्द कई दिल में सँभाले मैं ने

नाज़ बट

कुछ इस अदा से हमें ग़म-गुसार मिलते हैं

नाज़ बट

हरीस-ए-ख़्वाहिश-ए-लअ'ल-ओ-गुहर नहीं हुई मैं

नाज़ बट

दिल-ओ-निगाह की हैरत मैं रह गए हैं हम

नाज़ बट

छुपाएँ किस तरह आँखें चमक मोहब्बत की

नाज़ बट

चमन सा दश्त ता-हद्द-ए-नज़र कितना हसीं है

नाज़ बट

बे-ख़बर होते होए भी बा-ख़बर लगते हो तुम

नाज़ बट

मैं इन हसीन नज़ारों के पास आ न सका

नय्यर वास्ती

हैराँ है आँख चश्म-ए-इनायत को क्या हुआ

नय्यर वास्ती

सीने पे कितने दाग़ लिए फिर रहा हूँ मैं

नय्यर सुल्तानपुरी