Ghazal Poetry (page 419)

दिलदार हुआ ना-ख़ुश अब दिल का ख़ुदा-हाफ़िज़

नैन सुख

दीजे नहीं कसू को तो फिर लीजिए भी नहिं

नैन सुख

बहुतों ने जिसे अर्श पे बे-जान में देखा

नैन सुख

वो रुला कर हँस न पाया देर तक

नवाज़ देवबंदी

वो अपने घर के दरीचों से झाँकता कम है

नवाज़ देवबंदी

वहाँ कैसे कोई दिया जले जहाँ दूर तक ये हवा न हो

नवाज़ देवबंदी

तेरे आने की जब ख़बर महके

नवाज़ देवबंदी

तेग़ अपनी जगह दार अपनी जगह

नवाज़ देवबंदी

सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे

नवाज़ देवबंदी

मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते

नवाज़ देवबंदी

ले के माज़ी को जो हाल आया तो दिल काँप गया

नवाज़ देवबंदी

ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है

नवाज़ देवबंदी

दिल धड़कता है तो आती हैं सदाएँ तेरी

नवाज़ देवबंदी

था अजब सेमिनार का मौसम तब्सिरे हो रहे थे हर फ़न पर

नवाज़ असीमी

तिरे मस्लक में क्या इतना भी समझाया नहीं जाता

नवाज़ असीमी

तमाम अब्र पहाड़ों पे सर पटकते रहे

नवाज़ असीमी

तह-ए-मज़ार कौन है सर-ए-मज़ार कौन था

नवाज़ असीमी

क़सम ख़ुदा की बुलंदी से गुफ़्तुगू करते

नवाज़ असीमी

नतीजा देखिए कुछ दिन में क्या से क्या निकल आया

नवाज़ असीमी

न रौंदो काँच सी राहें हमारी

नवाज़ असीमी

मुग़ालता है उरूज-ओ-ज़वाल थोड़ी है

नवाज़ असीमी

मोम सिफ़त लोगों ने मेरा हँस के तमाशा देखा तो

नवाज़ असीमी

ख़तर हवा-ए-मुख़ालिफ़ का दरमियान में था

नवाज़ असीमी

जुनूँ पे छोड़ दी अब सारी ज़िंदगी मैं ने

नवाज़ असीमी

हवा के ज़ोर से जब बादबान फटने लगे

नवाज़ असीमी

ब-ज़ाहिर तो तनावर दिख रहे हैं

नवाज़ असीमी

पी के गिरने का है ख़याल हमें

नवाब ज़ियाउद्दीन ख़ाँ रख़्शां

साक़िया है ये जाम का आलम

नवाब सुलेमान शिकोह

जब तेग़ को पकड़ वो खूँ-ख़्वार घर से निकला

नवाब सुलेमान शिकोह

घर से बुर्क़ा जो उलट वो मह-ए-ताबाँ निकला

नवाब सुलेमान शिकोह