Ghazal Poetry (page 420)

औरों की तरह से अब न टालो

नवाब सुलेमान शिकोह

सुर्ख़-रू होने के क़ाबिल क्या हिना थी मैं न था

नवाब शाहजहाँ बेगम शाहजहाँ

गुमाँ मेहर-ए-दरख़्शाँ का हुआ है रू-ए-रौशन पर

नवाब शाहजहाँ बेगम शाहजहाँ

उस शजर पर कुछ दिनों तक आशियाँ मेरा भी था

नवाब शाहाबादी

अक्सर ज़मीं से उड़ के फ़लक पर गया हूँ मैं

नवाब शाहाबादी

वो लम्हे भूले नहीं रस्म-ओ-राह के अब तक

नवाब अहसन

ख़मोश इस लिए हम हैं कि बात घर की है

नवाब अहसन

जिसे हम ने कभी देखा नहीं है

नवाब अहसन

दौलत शोहरत क़त्ल तबाही क्या क्या हैं पहचान न पूछ

नवाब अहसन

अब सफ़र रात में ही करते हैं

नवाब अहसन

यूँ ही गलियों में मुक़द्दर दर-ब-दर मेरा भी है

नवनीत शर्मा

ये जो मुझ में अज़ाब है प्यारे

नवनीत शर्मा

सीने में मिरे बोझ भी और दहका चमन भी

नवनीत शर्मा

रास्ते से गए हटाए हम

नवनीत शर्मा

कोई मुझ से ख़फ़ा है इस लिए ख़ुद से ख़फ़ा हूँ

नवनीत शर्मा

ख़ुद से उस ने नजात पा ली है

नवनीत शर्मा

जो ये कहते थे कि मर जाना है

नवनीत शर्मा

हुए हैं फिर से अँधेरों के हौसले रौशन

नवनीत शर्मा

दर्द इस दर्जा मिले ज़ब्त में कामिल हुआ मैं

नवनीत शर्मा

बिना रोए गुज़रना उस गली से

नवनीत शर्मा

अब पसर आए हैं रिश्तों पे कुहासे कितने

नवनीत शर्मा

ये अजूबा तो हो नहीं सकता

नवीन सी. चतुर्वेदी

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं

नवीन सी. चतुर्वेदी

तमाम ख़ुश्क दयारों को आब देता था

नवीन सी. चतुर्वेदी

मकानों के नगर में हम अगर कुछ घर बना लेते

नवीन सी. चतुर्वेदी

महफ़िलों को गुज़ार पाए हम

नवीन सी. चतुर्वेदी

कितनी बार बताऊँ तुझ को कैसा लगता है

नवीन सी. चतुर्वेदी

जिस को अपने बस में करना था उस से ही लड़ बैठा

नवीन सी. चतुर्वेदी

हम वही नादाँ हैं जो ख़्वाबों को धर कर ताक पर

नवीन सी. चतुर्वेदी

हैरत-अंगेज़ हुआ चाहती है

नवीन सी. चतुर्वेदी