Ghazal Poetry (page 422)

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

नौशाद अली

आग इक और लगा देंगे हमारे आँसू

नौशाद अली

आबादियों में दश्त का मंज़र भी आएगा

नौशाद अली

ज़ुल्मत-ए-शब से उलझना है सहर होने तक

नो बहार साबिर

टूटता हूँ कभी जुड़ता हूँ मैं

नो बहार साबिर

सीम-ओ-ज़र चाहे न अलमास-ओ-गुहर माँगे है

नो बहार साबिर

मिरा वजूद है इक नक़्श-ए-आब की सूरत

नो बहार साबिर

मैं ख़ुद गया न उस की अदा ले गई मुझे

नो बहार साबिर

काँटे को फूल संग को गौहर कहा गया

नो बहार साबिर

कभी दहकती कभी महकती कभी मचलती आई धूप

नो बहार साबिर

जब सुख़न मौज-ए-तख़य्युल से रवानी माँगे

नो बहार साबिर

हयात क्या है मआल-ए-हयात क्या होगा

नो बहार साबिर

हर एक शख़्स ख़फ़ा मुझ से अंजुमन में था

नो बहार साबिर

हर एक शख़्स ख़फ़ा मुझ से अंजुमन में था

नो बहार साबिर

दूर था साहिल बहुत दरिया भी तुग़्यानी में था

नो बहार साबिर

दूर के जल्वों की शादाबी का दिल-दादा न हो

नो बहार साबिर

बूँद पानी की हूँ थोड़ी सी हवा है मुझ में

नो बहार साबिर

बादल अम्बर पे न धरती पे शजर है बाबा

नो बहार साबिर

मिरे मुक़द्दर में जो लिखा था नसीब से वो पहुँच न पाया

नातिक़ लखनवी

क्या बताऊँ दिल कहाँ है और किस जा दर्द है

नातिक़ लखनवी

कभी दामान-ए-दिल पर दाग़-ए-मायूसी नहीं आया

नातिक़ लखनवी

जो मेरे दिल में सहव तिरी याद से हुआ

नातिक़ लखनवी

है वही नाज़-आफ़रीं आईना-ए-नियाज़ में

नातिक़ लखनवी

दिल को हुआ है इश्क़ मोहब्बत के दाग़ से

नातिक़ लखनवी

ज़ाहिर न था नहीं सही लेकिन ज़ुहूर था

नातिक़ गुलावठी

वो मिज़ाज पूछ लेते हैं सलाम कर के देखो

नातिक़ गुलावठी

वस्फ़-ए-जमाल-ए-ज़ौक़ है अहल-ए-निगाह का

नातिक़ गुलावठी

उसी की देन है ग़म में गिला नहीं करता

नातिक़ गुलावठी

तो आख़िर साज़-ए-हस्ती क्यूँ तरब-आहंग-ए-महफ़िल था

नातिक़ गुलावठी

शम-ए-कुश्ता की तरह मैं तिरी महफ़िल से उठा

नातिक़ गुलावठी