Ghazal Poetry (page 423)
सर्द हो जाती है फ़िक्र-ए-जाह-ए-दुनिया जिस के बअ'द
नातिक़ गुलावठी
रिंदान-ए-बादा-नोश की छागल उठा तो ला
नातिक़ गुलावठी
रिंद की काएनात क्या है ख़ाक
नातिक़ गुलावठी
रहते हैं इस तरह से ग़म-ओ-यास आस-पास
नातिक़ गुलावठी
रह के अच्छा भी कुछ भला न हुआ
नातिक़ गुलावठी
पहुँच गए तो करेंगे इधर-उधर की तलाश
नातिक़ गुलावठी
नहीं रुकता तो जा ख़ुदा-हाफ़िज़
नातिक़ गुलावठी
मुद्दतें हो गई होता नहीं फेरा तेरा
नातिक़ गुलावठी
मिरे ग़म की उन्हें किस ने ख़बर की
नातिक़ गुलावठी
मजनूँ से जो नफ़रत है दीवानी है तू लैला
नातिक़ गुलावठी
महफ़िल-ए-नाज़ से मैं हो के परेशान उठा
नातिक़ गुलावठी
क्यूँ ख़याल-ए-रंज-ओ-राहत से न हों बेगाना हम
नातिक़ गुलावठी
क्या इरादे हैं वहशत-ए-दिल के
नातिक़ गुलावठी
क्या इरादे हैं वहशत-ए-दिल के
नातिक़ गुलावठी
किस को मेहरबाँ कहिए कौन मेहरबाँ अपना
नातिक़ गुलावठी
ख़ुद हो के कुछ ख़ुदा से भी मर्द-ए-ख़ुदा न माँग
नातिक़ गुलावठी
ख़िरद-आमोज़ हस्ती है मगर अब क्या कहूँ वो भी
नातिक़ गुलावठी
कर दिया दहर को अंधेर का मस्कन कैसा
नातिक़ गुलावठी
कभी सोज़-ए-दिल का गिला किया कभी लब से शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठा
नातिक़ गुलावठी
जुनूँ तलाश में है पा न ले बहार मुझे
नातिक़ गुलावठी
जो सुनते हैं तो मैं मम्नून हूँ उन की इनायत का
नातिक़ गुलावठी
जिस की हसरत थी उसे पा भी चुके खो भी चुके
नातिक़ गुलावठी
जीने देगा भी हमें ऐ दिल जिएँ भी या न हम
नातिक़ गुलावठी
इज़्तिराब-ए-दिल में आ जा कर दवाम आ ही गया
नातिक़ गुलावठी
इस ग़म को ग़म कहें तो कहें सौ में हम ग़लत
नातिक़ गुलावठी
ग़म जुदा पेश रहा है मिरे अफ़्कार जुदा
नातिक़ गुलावठी
ढूँडती है इज़्तिराब-ए-शौक़ की दुनिया मुझे
नातिक़ गुलावठी
ढूँढती है इज़्तिराब-ए-शौक़ की दुनिया मुझे
नातिक़ गुलावठी
देखता रहता हूँ अक्सर शाम-ए-क़ुदरत देख कर
नातिक़ गुलावठी
दयार-ए-होश की पहले जुनूँ ख़बर लेना
नातिक़ गुलावठी