Ghazal Poetry (page 424)

दम कोई दम का है मेहमाँ अलविदा'अ

नातिक़ गुलावठी

भर पाए जान-ए-ज़ार तिरी दोस्ती से हम

नातिक़ गुलावठी

भाग कि मंज़िल-ए-क़रार उम्र की रहगुज़र नहीं

नातिक़ गुलावठी

बज़्म-ए-दुनिया जिस को कहते हैं वो पागल-ख़ाना था

नातिक़ गुलावठी

बादा-मस्ती आ करामत हो के मयख़ाने में आ

नातिक़ गुलावठी

ऐ मुसव्विर सूरत-ए-दिल-गीर खींच

नातिक़ गुलावठी

आया तो दिल-ए-वहशी दर-बंद-ए-नियाज़ आया

नातिक़ गुलावठी

आलम-ए-कौन-ओ-मकाँ नाम है वीराने का

नातिक़ गुलावठी

आज मय-ख़ाने में बरकत ही सही

नातिक़ गुलावठी

आ के बज़्म-ए-हस्ती में क्या बताएँ क्या पाया

नातिक़ गुलावठी

आ गई दिल की लगी बढ़ के रग-ए-जाँ के क़रीब

नातिक़ गुलावठी

मैं चंचल इठलाती नदिया भँवर से कब तक बचती मैं

नसरीन नक़्क़ाश

क्या हक़ीक़त है क्या कहानी है

नसरीन नक़्क़ाश

हम ने होंटों पे तबस्सुम को सजा कर देखा

नसरीन नक़्क़ाश

वो ख़ौफ़-ए-जाँ था कि लब खोलना गवारा न था

नस्र ग़ज़ाली

रुख़-ए-बहार पे अक्स-ए-ख़िज़ाँ भी कितनी देर

नस्र ग़ज़ाली

बर्फ़-ज़ार-ए-जाँ की तह में खोलते पानी का है

नस्र ग़ज़ाली

वो रोब-ए-हुस्न था उस का सलाम भूल गया

नासिर ज़ैदी

वो मिरे ग़म का मुदावा नहीं होने देता

नासिर ज़ैदी

वो एक शख़्स कि जिस से शिकायतें थीं बहुत

नासिर ज़ैदी

तुम तो औरों पे न पत्थर फेंको

नासिर ज़ैदी

तुझ से मिलूँगा फिर कभी ख़्वाब-ओ-ख़याल भी नहीं

नासिर ज़ैदी

थोड़ा सा मुस्कुरा के निगाहें मिलाइए

नासिर ज़ैदी

शौक़-ए-दिल-ए-वारफ़्ता का इक सैद-ए-ज़बूँ हूँ!

नासिर ज़ैदी

रूह-ए-एहसास है तही-दामन

नासिर ज़ैदी

रात सुनसान है गली ख़ामोश

नासिर ज़ैदी

फूल सहरा में खिला दे कोई

नासिर ज़ैदी

मिसाल-ए-सादा-वरक़ था मगर किताब में था

नासिर ज़ैदी

कह रही है ये क्या सबा कुछ सोच

नासिर ज़ैदी

कभी भूले से मुमकिन हो मिरी जानिब अगर होना

नासिर ज़ैदी