Ghazal Poetry (page 425)
जो मेरी आख़िरी ख़्वाहिश की तर्जुमाँ ठहरी
नासिर ज़ैदी
जानिब-ए-दश्त कभी तुम भी निकल कर देखो
नासिर ज़ैदी
इस तवक़्क़ो पे खुला रक्खा गरेबाँ अपना
नासिर ज़ैदी
एहसास के शरर को हुआ देने आऊँगा
नासिर ज़ैदी
दयार-ए-शौक़ में कोसों कहीं हवा भी नहीं
नासिर ज़ैदी
बुझी है आग मगर इस क़दर ज़ियादा नहीं
नासिर ज़ैदी
भला कब तक कोई तन्हा रहेगा
नासिर ज़ैदी
आँखों में चुभ रही है गुज़रती रुतों की धूप
नासिर ज़ैदी
ज़िद न कर मत समय मिलन का उजाड़
नासिर शहज़ाद
यख़-बस्ता ठंडकों में उजाला जड़ा हुआ
नासिर शहज़ाद
तुझ से मिलने की इल्तिजा कैसी
नासिर शहज़ाद
तू दर्द-ए-ताज़ा के उनवान की महूरत है
नासिर शहज़ाद
तो शराफ़तों का मक़ाम है तो सदाक़तों का दवाम है
नासिर शहज़ाद
तिरे हाथ पे खेतों की मिट्टी मिरा मोतियों वाला जामा
नासिर शहज़ाद
सूरज सुर्ख़ दिशा में उतरा
नासिर शहज़ाद
सूना लगा बग़ैर तिरे मुझ को सारा घर
नासिर शहज़ाद
रुत ने रिवायत के रुख़ बदले हर मसऊद सऊद गया
नासिर शहज़ाद
रंग और रूप के प्रदीप में खोने दे मुझे
नासिर शहज़ाद
रब्त भी तोड़ा बनी नित की तलब का बेस भी
नासिर शहज़ाद
क़यास बन-बास को मुआ'नी दे
नासिर शहज़ाद
फिर लहलहा उठा समय आमों पे बौर का
नासिर शहज़ाद
पास भी रह कर दूर है तो
नासिर शहज़ाद
प्राण प्रीतम पे वार कर देखो
नासिर शहज़ाद
नस नस में नशा प्यार का मामूर हुआ है
नासिर शहज़ाद
नई-निकोर निराली पर
नासिर शहज़ाद
नैन नशे की चढ़ती नुमू पर
नासिर शहज़ाद
लोग थे क्या जो अज़लों से मुश्ताक़ हुए
नासिर शहज़ाद
खड़ा जूड़ा गुँधी बालों की चोटी
नासिर शहज़ाद
कह दे मन की बात तो गोरी काहे को शरमाती है
नासिर शहज़ाद
जल भी मिलन के कष्ट का थल भी अमीन था
नासिर शहज़ाद