Ghazal Poetry (page 421)
ग़नीमत से गुज़ारा कर रहा हूँ
नवीन सी. चतुर्वेदी
ग़म की ढलवान तक आए तो ख़ुशी तक पहुँचे
नवीन सी. चतुर्वेदी
चढ़ा कर तीर नज़रों की कमाँ पर
नवीन सी. चतुर्वेदी
भुला दिया है जो तू ने तो कुछ मलाल नहीं
नवीन सी. चतुर्वेदी
और तो अपनी क़िस्मत में क्या लिक्खा है
नवीन सी. चतुर्वेदी
और तआ'रुफ़ हमारा हो भी क्या
नवीन सी. चतुर्वेदी
कुछ इस तरह सुला दिया गया मुझे
नवेद रज़ा
ख़्वाब में तेरी शक्ल समो नहीं सकता मैं
नवेद रज़ा
जुदा हुए तो जुदाई में ये कमाल भी था
नवेद रज़ा
सुर्ख़ चश्म इतनी कहीं होती है बेदारी से
नवाब मोहम्मद यार ख़ाँ अमीर
ज़ंजीर-ए-जुनूँ कुछ और खनक हम रक़्स-ए-तमन्ना देखेंगे
नौशाद अली
ये बातें आज की कल जिस किताब में लिखना
नौशाद अली
उलझे तो सब नशेब-ओ-फ़राज़-ए-हयात में
नौशाद अली
ठोकरें खाइए पत्थर भी उठाते चलिए
नौशाद अली
सब कुछ सर-ए-बाज़ार-ए-जहाँ छोड़ गया है
नौशाद अली
सब कुछ सर-ए-बाज़ार जहाँ छोड़ गया है
नौशाद अली
पहले तो डर लगा मुझे ख़ुद अपनी चाप से
नौशाद अली
न मंदिर में सनम होते न मस्जिद में ख़ुदा होता
नौशाद अली
मुझ को मुआफ़ कीजिए रिंद-ए-ख़राब जान के
नौशाद अली
क्यूँ मिली थी हयात याद करो
नौशाद अली
ख़ुद मिट के मोहब्बत की तस्वीर बनाई है
नौशाद अली
ख़ैर माँगी जो आशियाने की
नौशाद अली
जहाँ तक याद-ए-यार आती रहेगी
नौशाद अली
हम दोस्तों के लुत्फ़-ओ-करम देखते रहे
नौशाद अली
हाए कैसी वो शाम होती है
नौशाद अली
इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए
नौशाद अली
दुनिया कहीं जो बनती है मिटती ज़रूर है
नौशाद अली
दीदा-ए-अश्क-बार ले के चले
नौशाद अली
बहुत ही दिल-नशीं आवाज़-ए-पा थी
नौशाद अली
अपनी तदबीर न तक़दीर पे रोना आया
नौशाद अली