Ghazal Poetry (page 412)

करने लगा दिल तलब जब वो बुत-ए-ख़ुश-मिज़ाज

नज़ीर अकबराबादी

कर लेते अलग हम तो दिल इस शोख़ से कब का

नज़ीर अकबराबादी

कल उस के चेहरे को हम ने जो आफ़्ताब लिखा

नज़ीर अकबराबादी

कल नज़र आया चमन में इक अजब रश्क-ए-चमन

नज़ीर अकबराबादी

कल मिरे क़त्ल को इस ढब से वो बाँका निकला

नज़ीर अकबराबादी

कल जो रुख़-ए-अ'रक़-फ़िशाँ यार ने टुक दिखा दिया

नज़ीर अकबराबादी

कई दिन से हम भी हैं देखे उसे हम पे नाज़ ओ इताब है

नज़ीर अकबराबादी

कहते हैं याँ कि ''मुझ सा कोई मह-जबीं नहीं''

नज़ीर अकबराबादी

कहते हैं जिस को 'नज़ीर' सुनिए टुक उस का बयाँ

नज़ीर अकबराबादी

कहने उस शोख़ से दिल का जो मैं अहवाल गया

नज़ीर अकबराबादी

कहा ये आज हमें फ़हम ने सुनो साहिब

नज़ीर अकबराबादी

कहा था हम ने तुझे तो ऐ दिल कि चाह की मय को तू न पीना

नज़ीर अकबराबादी

कहा जो हम ने ''हमें दर से क्यूँ उठाते हो''

नज़ीर अकबराबादी

कभी तो आओ हमारे भी जान कोठे पर

नज़ीर अकबराबादी

कब ग़ैर ने ये सितम सहे चुप

नज़ीर अकबराबादी

जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो

नज़ीर अकबराबादी

जो तुम ने पूछा तो हर्फ़-ए-उल्फ़त बर आया साहिब हमारे लब से

नज़ीर अकबराबादी

जो पूछा मैं ने याँ आना मिरा मंज़ूर रखिएगा

नज़ीर अकबराबादी

जो कुछ है हुस्न में हर मह-लक़ा को ऐश-ओ-तरब

नज़ीर अकबराबादी

जो कहते हो चलें हम भी तिरे हमराह बिस्मिल्लाह

नज़ीर अकबराबादी

जो दिल को दीजे तो दिल में ख़ुश हो करे है किस किस तरह से हलचल

नज़ीर अकबराबादी

जो दिल को दीजे तो दिल में ख़ुश हो करे है किस किस तरह से हलचल

नज़ीर अकबराबादी

जो आवे मुँह पे तिरे माहताब है क्या चीज़

नज़ीर अकबराबादी

जिन दिनों हम को उस से था इख़्लास

नज़ीर अकबराबादी

झमक दिखाते ही उस दिल-रुबा ने लूट लिया

नज़ीर अकबराबादी

जाम न रख साक़िया शब है पड़ी और भी

नज़ीर अकबराबादी

जाल में ज़र के अगर मोती का दाना होगा

नज़ीर अकबराबादी

जहाँ है क़द उस का जल्वा-फ़रमा तो सर्व वाँ किस हिसाब में है

नज़ीर अकबराबादी

जब उस की ज़ुल्फ़ के हल्क़े में हम असीर हुए

नज़ीर अकबराबादी

जब उस के ही मिलने से नाकाम आया

नज़ीर अकबराबादी