Ghazal Poetry (page 403)

मुझ को समझो यादगार-ए-रफ़्तगान-ए-लखनऊ

नज़्म तबा-तबाई

क्या कारवान-ए-हस्ती गुज़रा रवा-रवी में

नज़्म तबा-तबाई

कोई मय दे या न दे हम रिंद-ए-बे-पर्वा हैं आप

नज़्म तबा-तबाई

किसी से बस कि उमीद-ए-कुशूद-ए-कार नहीं

नज़्म तबा-तबाई

किस लिए फिरते हैं ये शम्स ओ क़मर दोनों साथ

नज़्म तबा-तबाई

जुनूँ के वलवले जब घुट गए दिल में निहाँ हो कर

नज़्म तबा-तबाई

इस वास्ते अदम की मंज़िल को ढूँडते हैं

नज़्म तबा-तबाई

इस महीना भर कहाँ था साक़िया अच्छी तरह

नज़्म तबा-तबाई

हँसी में वो बात मैं ने कह दी कि रह गए आप दंग हो कर

नज़्म तबा-तबाई

एहसान ले न हिम्मत-ए-मर्दाना छोड़ कर

नज़्म तबा-तबाई

बिदअ'त मस्नून हो गई है

नज़्म तबा-तबाई

अबस है नाज़-ए-इस्तिग़्ना पे कल की क्या ख़बर क्या हो

नज़्म तबा-तबाई

आ के मुझ तक कश्ती-ए-मय साक़िया उल्टी फिरी

नज़्म तबा-तबाई

आ गया फिर रमज़ाँ क्या होगा

नज़्म तबा-तबाई

मोहब्बत में निगाह-ए-शर्मगीं जीने नहीं देती

नाज़िश सिकन्दरपुरी

मिरा दिल संग-दिल ने दिल का अरमाँ बन के लूटा है

नाज़िश सिकन्दरपुरी

जान-ए-बहार-ए-ज़िंदगी आँखें ज़रा मिलाए जा

नाज़िश सिकन्दरपुरी

ज़िक्र-ए-नशात ख़ल्वत-ए-ग़म में बुरा लगे

नाज़िश प्रतापगढ़ी

यूँ लोग चौंक चौंक कर उँगली उठाए हैं

नाज़िश प्रतापगढ़ी

वो समझता है उसे जो राज़-दार-ए-नग़्मा है

नाज़िश प्रतापगढ़ी

कुछ दूर साथ गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर गई

नाज़िश प्रतापगढ़ी

दिल-ए-ख़ुलूस-गज़ीदा को कोई क्या जाने

नाज़िश प्रतापगढ़ी

बे-चेहरगी-ए-ग़म से परेशान खड़े हैं

नाज़िश प्रतापगढ़ी

आप के इल्तिफ़ात का ग़म हो

नाज़िश प्रतापगढ़ी

आह को नग़्मा कि नग़्मे को फ़ुग़ाँ करना पड़े

नाज़िश प्रतापगढ़ी

धूल से राह अटी हो गई मंज़िल मादूम

नाज़िश काश्मीरी

तिरे कानों में कोई बात बतानी थी हमें

नाज़िर वहीद

पलकों से आसमाँ को इशारा करो कभी

नाज़िर वहीद

इस नए ग़म से किनारा भी तो हो सकता है

नाज़िर वहीद

हम ने जलते हुए ख़ेमों की वो शामें रख दीं

नाज़िर वहीद