Ghazal Poetry (page 465)

मेरी सी तू ने गुल से न गर ऐ सबा कही

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

मज़हब की मेरे यार अगर जुस्तुजू करें

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

मौज-ए-निकहत की सबा देख सवारी तय्यार

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

मसलख़-ए-इश्क़ में खिंचती है ख़ुश-इक़बाल की खाल

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

माशूक़ा-ए-गुल नक़ाब में है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

मख़्लूक़ हूँ या ख़ालिक़-ए-मख़्लूक़-नुमा हूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

मैं पहरों घर में पड़ा दिल से बात करता हूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

लोग कहते हैं मोहब्बत में असर होता है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

लिए आदम ने अपने बेटे पाँच

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

लेने लगे जो चुटकी यक-बार बैठे बैठे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

लेखे की याँ बही न ज़र-ओ-माल की किताब

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

लगते हैं नित जो ख़ूबाँ शरमाने बावले हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क्यूँ कि कहिए कि अदा-बंदी है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क्या मैं जाता हूँ सनम छुट तिरे दर और कहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क्या खींचे है ख़ुद को दूर अल्लाह

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क्या दख़्ल किसी से मरज़-ए-इश्क़ शिफ़ा हो

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क्या चमके अब फ़क़त मिरी नाले की शायरी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कुछ अपनी जो हुर्मत तुझे मंज़ूर हो ऐ शैख़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

किस राह गया लैला का महमिल नहीं मालूम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कीजिए ज़ुल्म सज़ा-वार-ए-जफ़ा हम ही हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

किधर जाइए और कहाँ बैठिए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

किबरियाई की अदा तुझ में है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

की आह हम ने लेकिन उस ने इधर न देखा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ख़्वारियाँ बदनामियाँ रुस्वाइयाँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ख़्वाब था या ख़याल था क्या था

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ख़ुश-तालई में शम्स ओ क़मर दोनों एक हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ख़ुदा की क़सम फिर तो क्या ख़ैर होवे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

खेल जाते हैं जान पर आशिक़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ख़रीदार अपना हम को जानते हो

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

खड़ा न सुन के सदा मेरी एक यार रहा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी