Ghazal Poetry (page 466)

खा लेते हैं ग़ुस्से में तलवार कटारी क्या

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कपड़े बदल के आए थे आग मुझे लगा गए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कल तो खेले था वो गिली डंडा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कल पतंग उस ने जो बाज़ार से मँगवा भेजा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कहती है नमाज़-ए-सुब्ह की बाँग

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कहीं मग़्ज़ उस के मैं सुब्ह-दम तिरी बू-ए-ज़ुल्फ़-ए-रसा गई

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कह गया कुछ तो ज़ेर-ए-लब कोई

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कभू तक के दर को खड़े रहे कभू आह भर के चले गए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कभी वफ़ाएँ कभी बेवफ़ाइयाँ देखीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कभी तो बैठूँ हूँ जा और कभी उठ आता हूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कब सबा सू-ए-असीरान-ए-क़फ़स आती है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कब लग सके जफ़ा को उस की वफ़ा-ए-आलम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

कब ख़ूँ में भरा दामन-ए-क़ातिल नहीं मालूम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

काम में अपने ज़ुहूर-ए-हक़ है आप

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जूँ ही ज़ंजीर के पास आए पाँव

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जो परी भी रू-ब-रू हो तो परी को मैं न देखूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जो दम हुक़्क़े का दूँ बोले कि ''मैं हुक़्क़ा नहीं पीता''

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जीता रहूँ कि हिज्र में मर जाऊँ क्या करूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जी से मुझे चाह है किसी की

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जाते जाते राह में उस ने मुँह से उठाया जूँही पर्दा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जल्वा-गर उस का सरापा है बदन आइने में

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जलता है जिगर तो चश्म नम है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जब तक ये मोहब्बत में बदनाम नहीं होता

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जब तक कि तिरी गालियाँ खाने के नहीं हम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जब से साने ने बनाया है जहाँ का बहरूप

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जब नबी-साहिब में कोह-ओ-दश्त से आई बसंत

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जब कि बे-पर्दा तू हुआ होगा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जब घर से वो बाद-ए-माह निकले

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जाने दे टुक चमन में मुझे ऐ सबा सरक

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी