Ghazal Poetry (page 468)

गरचे ऐ दिल आशिक़-ए-शैदा है तू

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

गर हम से न हो वो दिल-सिताँ एक

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

गर हो तमंचा-बंद वो रश्क-ए-फ़िरंगियाँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

गर और भी मिरी तुर्बत पे यार ठहरेगा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

गर अब्र घिरा हुआ खड़ा है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

फ़हमीदा है जो तुझ को तो फ़हमीद से निकल

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

एक तो बैठे हो दिल को मिरे खो और सुनो

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इक हर्फ़-ए-कुन में जिस ने कौन-ओ-मकाँ बनाया

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दूर से मुझ को न मुँह अपना दिखाओ जाओ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दूकान-ए-मय-फ़रोश पे गर आए मोहतसिब

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल्ली हुई है वीराँ सूने खंडर पड़े हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिलबर की तमन्ना-ए-बर-ओ-दोश में मर जाए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल सीने में बेताब है दिलदार किधर है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल में मुर्ग़ान-ए-चमन के तो गुमाँ और ही है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल में है उस के मुद्दई का इश्क़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल को ये इज़्तिरार कैसा है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल ख़ुश न हुआ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से निकल कर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल के नगर में चार तरफ़ जब ग़म की दुहाई बैठ गई

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दिल चुराना ये काम है तेरा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

देख उस को इक आह हम ने कर ली

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

देख कर इक जल्वे को तेरे गिर ही पड़ा बे-ख़ुद हो मूसा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दरिया-ए-आशिक़ी में जो थे घाट घाट साँप

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दर तलक जाने की है उस के मनाही हम को

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दर तलक आ के टुक आवाज़ सुना जाओ जी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

दम ग़नीमत है कि वक़्त-ए-ख़ुश-दिली मिलता नहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

छुरियाँ चलीं शब दिल ओ जिगर पर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

चश्म ने की गौहर-अफ़्शानी सरीह

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

चले ले के सर पर गुनाहों की गठरी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

चखी न जिस ने कभी लज़्ज़त-ए-सिनान-ए-निगाह

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

बुलबुलो बाग़बाँ को क्यूँ छेड़ा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी