Ghazal Poetry (page 469)
बोइए मज़रा-ए-दिल में जो इनायात के बीज
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बिकते हैं शहर में गुल-ए-बे-ख़ार हर तरफ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
भरी आती हैं हर घड़ी आँखें
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बे-लाग हैं हम हम को रुकावट नहीं आती
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बज़्म-ए-सुरूद-ए-ख़ूबाँ में गो मर्दनगीं शाहीन बजीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बस हम हैं शब और कराहना है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बर्क़-ए-रुख़्सार-ए-यार फिर चमकी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बंद भी आँखों को ज़री कीजिए
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बनाया एक काफ़िर के तईं उस दम मैं दो काफ़िर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बैठे बैठे जो हम ऐ यार हँसे और रोए
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बहस उस की मेरी वक़्त-ए-मुलाक़ात बढ़ गई
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बाग़ था उस में आशियाँ भी था
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बचा गर नाज़ से तो उस को फिर अंदाज़ से मारा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
बात को मेरी अलग हो के न शरमाओ सुनो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ब'अद-ए-मुर्दन की भी तदबीर किए जाता हूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अज़-बस-कि जी है तुझ बिन बेज़ार ज़िंदगी से
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अज़-बस भला लगे है तू मेरे यार मुझ को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अव्वल तो ये धज और ये रफ़्तार ग़ज़ब है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अव्वल तो तिरे कूचे में आना नहीं मिलता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अक़्ल गई है सब की खोई क्या ये ख़ल्क़ दिवानी है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अपना रफ़ीक़-ओ-आश्ना ग़ैर-ए-ख़ुदा कोई नहीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ऐसे डरे हैं किस की निगाह-ए-ग़ज़ब से हम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ऐ शब हिज्र कहीं तेरी सहर है कि नहीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ऐ इश्क़ तेरी अब के वो तासीर क्या हुई
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ऐ ग़म-ज़दा ज़ब्त कर के चलना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अहल-ए-दिल गर जहाँ से उठता है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अभी अपने मर्तबा-ए-हुस्न से मियाँ बा-ख़बर तू हुआ नहीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
अब मुझ को गले लगाओ साहिब
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आतिश-ए-ग़म में बस कि जलते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आता है यही जी में फ़रियाद करूँ रोऊँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी